ग्रुप कैप्टन वरूण सिंह को अंतिम विदाई , विश्रामघाट पर हुआ अंतिम संस्कार

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न्यूज जंगल डेस्क। कानपुर। सीडीएस चौपर हादसे में दिवंगत हुए शौर्य चक्र से सम्मानित ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह को भोपाल में पूरे शहर ने अंतिम विदाई दी। मिलेट्री हॉस्पिटल से उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई जो विश्राम घाट के लिए रवाना हुई तो फूलों की बारिश की गई। इसके साथ ही अंतिम यात्रा में भारत माता की जय, वंदे मातरम और वरुण सिंह अमर रहें के नारे लगे। बैरागढ़ विश्रामघाट पर वरुण सिंह का राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया। 

भोपाल में  ग्रुप कैप्टन वरुण सिंह के पार्थव शरीर को गुरुवार को उनके घर से ससम्मान ले जाकर मिलेट्री हॉस्पिटल की मर्चुरी में रख दिया गया था। आज सुबह दस बजे उनकी अंतिम यात्रा मिलेट्री हॉस्पिटल से शुरू हुई। फूलों से सजे सैन्य वाहन में तिरंगे में लिपटे ग्रुप कैप्टन वरुण के पार्थिव शरीर को जब रखा गया तो भारत माता की जय, वरुण सिंह अमर रहे, जब तक सूरज चांद रहेगा वरुणजी का नाम रहेगा, के नारों से माहौल गूंज उठा। 

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मिलेट्री हॉस्पिटल से अंतिम यात्रा निकली तो उसके पीछे भारी भीड़ रही। वरुण सिंह के परिवारजन, मित्रों के अलावा उन्हें अंतिम विदाई देने के लिए भोपाल के कई सारे लोग थे। स्थानीय भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा व कांग्रेस विधायक पीसी शर्मा अंतिम यात्रा में शामिल हुए। कई नन्हें मुन्ने बच्चे भी वरुण सिंह को अंतिम विदाई देने के लिए सड़क किनारे खड़े थे। वरुण सिंह की तस्वीर लेकर सैल्यूट करते हुए लोग भी सड़क पर दिखाई दे रहे थे। 

अंतिम यात्रा सुबह 11 बजे बैरागढ़ विश्रामघाट पहुंची जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी पहुंचे। वहां सैन्य अधिकारियों सहित सीएम चौहान, मंत्री विश्वास सारंग, विधायक रामेश्वर शर्मा, पीसी शर्मा आदि ने भी पुष्पचक्र से श्रद्धांजलि दी। परिवार की महिलाएं भी विश्रामघाट पर पहुंचीं और उन्होंने ग्रुप कैप्टन को अंतिम विदाई दी। उन्हें गॉड ऑफ ऑनर दिया गया और इसके बाद राजकीय सम्मान के साथ ग्रुप कैप्टन के छोटे भाई की मदद से बेटे रिद्धिमन ने मुखाग्नि दी। 

वरुण सिंह का जन्म दिल्ली में हुआ था। उन्हें इसी साल शौर्य चक्र से सम्मानित किया गया। वे मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में खोरमा कन्हौली के रहने वाले थे। फाइटर प्लेन चलाने वाले वरुण सिंह ने तेजस की 10 हजार फीट से सुरक्षित लेंडिंग की थी। वे 2002 में एनडीए से चयनित हुए थे और इसके बाद उन्होंने कई बहादुरी के काम किए। मगर आठ दिसंबर को सीडीएस के जो हेलीकॉप्टर क्रेश की घटना हुई, उसमें वे एकमात्र ऐसे व्यक्ति थे जिनकी सांसें चार दिन तक चलीं। इसमें बैठे सीडीएस बिपिन रावत व उनकी पत्नी मधुलिका सहित 14 अन्य लोगों की उसी दिन मृत्यु हो गई थी। 

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