India Ethanol Production: भारत में पेट्रोल के साथ एथेनॉल मिलाने की योजना को बढ़ावा दिया जा रहा है। अब 100 फीसदी एथेनॉल से चलने वाले वाहनों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है। ऐसे में एक बड़ा सवाल है कि भारत में गन्ने का कितना हिस्सा एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल होता है और कितना हिस्सा चीनी उत्पादन के लिए बचता है? दरअसल, गन्ना भारत की चीनी इंडस्ट्री के साथ-साथ एथेनॉल अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण कच्चा माल बन गया है।
गन्ने से कैसे बनाया जाता है एथेनॉल?
गन्ने से मुख्य रूप से दो तरीकों से एथेनॉल तैयार किया जाता है। पहला तरीका गन्ने के रस यानी जूस का इस्तेमाल करना है। दूसरे तरीके में चीनी मिलों से निकलने वाले शीरे (मोलासेस) का उपयोग किया जाता है। शीरा चीनी बनाने की प्रक्रिया के दौरान बचा हुआ गाढ़ा पदार्थ होता है, जिसमें किण्वन के जरिए एथेनॉल तैयार किया जा सकता है।
इसके अलावा बी-हैवी मोलासेस और सी-हैवी मोलासेस से भी एथेनॉल बनाया जाता है। इससे चीनी उत्पादन और एथेनॉल निर्माण के बीच संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है।
चीनी के लिए कितना गन्ना बचता है?
गन्ने का कितना हिस्सा चीनी बनाने में इस्तेमाल होगा और कितना एथेनॉल उत्पादन में जाएगा, यह हर साल की जरूरत, गन्ने की उपलब्धता, चीनी की मांग और सरकार की नीतियों पर निर्भर करता है। जब गन्ने के रस या बी-हैवी शीरे को एथेनॉल बनाने में इस्तेमाल किया जाता है, तो उससे संभावित चीनी उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, सी-हैवी शीरे से एथेनॉल बनाने पर चीनी उत्पादन पर अपेक्षाकृत कम असर पड़ता है, क्योंकि यह चीनी बनाने के बाद बचने वाला उप-उत्पाद है।
भारत में कितना बनता है एथेनॉल?
भारत में एथेनॉल उत्पादन का दायरा पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। सरकार ने पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने का लक्ष्य तय किया है। इसके तहत 2025-26 तक पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल ब्लेंडिंग का लक्ष्य रखा गया था। सरकार के मुताबिक, एथेनॉल सप्लाई वर्ष 2024-25 में पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की दर 19.24 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।
हालांकि, एथेनॉल का उत्पादन केवल गन्ने से नहीं होता। अब मक्का और अन्य अनाज भी इसके बड़े स्रोत बन चुके हैं। अगस्त 2026 में जारी सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश में उत्पादित एथेनॉल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अनाज, खासकर मक्का से आता है।
एथेनॉल के लिए कितनी चीनी इस्तेमाल होती है?
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2025-26 में एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी का डायवर्जन लगभग 9 प्रतिशत रहा, जबकि 2022-23 में यह करीब 12 प्रतिशत था। इसका मतलब है कि एथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा पहले की तुलना में कम हुआ है।
चीनी उद्योग के अनुमान के मुताबिक, 2025-26 सीजन में एथेनॉल उत्पादन के लिए लगभग 34 लाख टन चीनी डायवर्ट होने का अनुमान लगाया गया था। इसके बाद शुद्ध चीनी उत्पादन करीब 309.5 लाख टन रहने का अनुमान था।
चीनी बनाने के बाद कितना गन्ना बचता है?
यह समझना जरूरी है कि गन्ने का इस्तेमाल केवल चीनी और एथेनॉल बनाने तक सीमित नहीं है। इससे गुड़, खांडसारी और दूसरे उत्पाद भी तैयार किए जाते हैं। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि गन्ने का एक निश्चित हिस्सा हमेशा चीनी के लिए और दूसरा एथेनॉल के लिए बचता है।
गन्ने की उपलब्धता, चीनी की घरेलू मांग, अंतरराष्ट्रीय बाजार और सरकारी नीतियों के आधार पर हर सीजन में इसका इस्तेमाल बदलता रहता है।
किसानों और चीनी मिलों को क्या फायदा?
एथेनॉल उत्पादन बढ़ने से चीनी मिलों को अतिरिक्त आमदनी का स्रोत मिलता है। इससे मिलों की आर्थिक स्थिति बेहतर हो सकती है और किसानों को गन्ने का भुगतान समय पर करने में मदद मिलती है।
इसके अलावा पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता कम करने और वैकल्पिक ईंधन को बढ़ावा देने में भी मदद मिलती है।
इस तरह भारत में एथेनॉल उत्पादन केवल ईंधन का विकल्प नहीं, बल्कि कृषि, किसानों की आय और चीनी उद्योग से जुड़ी अर्थव्यवस्था का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
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