प्री-डायबिटीज के इन संकेतों को न करें नजरअंदाज, जानिए ब्लड शुगर को कैसे करें कंट्रोल


 Prediabetes Symptoms: डायबिटीज आज के समय में तेजी से बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल है। हालांकि, टाइप-2 डायबिटीज होने से पहले शरीर में प्री-डायबिटीज की स्थिति विकसित हो सकती है। इसमें ब्लड शुगर का स्तर सामान्य से अधिक होता है, लेकिन वह डायबिटीज की निर्धारित सीमा तक नहीं पहुंचता। यह स्थिति भविष्य में टाइप-2 डायबिटीज होने के खतरे को बढ़ा सकती है। अच्छी बात यह है कि समय पर पहचान, खानपान में सुधार, नियमित शारीरिक गतिविधि और वजन को नियंत्रित रखकर इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

क्या होती है प्री-डायबिटीज?

प्री-डायबिटीज ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर इंसुलिन का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं कर पाता या पर्याप्त इंसुलिन बनाने में परेशानी होती है। इंसुलिन एक हार्मोन है, जो खून में मौजूद ग्लूकोज को शरीर की कोशिकाओं तक पहुंचाने में मदद करता है।

जब इंसुलिन प्रभावी तरीके से काम नहीं करता, तो ब्लड शुगर बढ़ने लगता है। अगर इस स्थिति पर समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो कुछ लोगों में आगे चलकर टाइप-2 डायबिटीज विकसित हो सकती है। हालांकि, प्री-डायबिटीज होने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति को भविष्य में डायबिटीज होना निश्चित है।

प्री-डायबिटीज के लक्षण क्या हैं?

प्री-डायबिटीज की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इसके अक्सर कोई स्पष्ट लक्षण दिखाई नहीं देते। कई लोगों को इसका पता नियमित ब्लड शुगर जांच के दौरान ही चलता है।

कुछ लोगों में त्वचा पर बदलाव, खासकर गर्दन या बगल के आसपास त्वचा का गहरा और मोटा होना, इंसुलिन प्रतिरोध का संकेत हो सकता है। इसके अलावा, अधिक वजन, शारीरिक गतिविधि की कमी और परिवार में डायबिटीज का इतिहास जोखिम बढ़ा सकते हैं।

बहुत ज्यादा प्यास लगना, बार-बार पेशाब आना, बिना कारण वजन कम होना और अत्यधिक थकान जैसे लक्षण बढ़े हुए ब्लड शुगर के संकेत हो सकते हैं। ऐसे लक्षण होने पर डॉक्टर से जांच कराना जरूरी है।

प्री-डायबिटीज की पहचान कैसे करें?

प्री-डायबिटीज की पुष्टि केवल लक्षणों के आधार पर नहीं की जा सकती। इसके लिए ब्लड टेस्ट किए जाते हैं। इनमें मुख्य रूप से फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज, HbA1c और जरूरत के अनुसार ओरल ग्लूकोज टॉलरेंस टेस्ट शामिल हैं।

HbA1c टेस्ट पिछले लगभग दो से तीन महीनों के औसत ब्लड शुगर का अनुमान देता है। अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन के अनुसार, HbA1c का स्तर 5.7 से 6.4 प्रतिशत के बीच होने पर प्री-डायबिटीज की श्रेणी में रखा जाता है। हालांकि, जांच के नतीजों का आकलन डॉक्टर व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति के अनुसार करते हैं।

प्री-डायबिटीज को कैसे करें रिवर्स?

1. खानपान में सुधार करें: भोजन में हरी सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, फल और फाइबर से भरपूर खाद्य पदार्थ शामिल करें। मीठे पेय, अत्यधिक चीनी और रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट का सेवन सीमित रखें।

2. नियमित व्यायाम करें: सप्ताह में कम से कम 150 मिनट तेज चलने जैसी मध्यम तीव्रता वाली शारीरिक गतिविधि करने का लक्ष्य रखें। अपनी क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार व्यायाम चुनें।

3. वजन नियंत्रित रखें: यदि वजन अधिक है, तो धीरे-धीरे वजन कम करने से इंसुलिन की कार्यक्षमता में सुधार हो सकता है। शरीर के शुरुआती वजन का लगभग 5 से 7 प्रतिशत कम करना कुछ लोगों के लिए फायदेमंद हो सकता है।

4. नींद और तनाव पर ध्यान दें: पर्याप्त नींद लें और तनाव कम करने के लिए योग, ध्यान या अन्य आरामदायक गतिविधियों को दिनचर्या में शामिल करें।

5. नियमित जांच कराएं: जोखिम वाले लोगों को डॉक्टर की सलाह के अनुसार ब्लड शुगर की जांच करानी चाहिए। जरूरत पड़ने पर डॉक्टर दवा की सलाह भी दे सकते हैं।

क्या प्री-डायबिटीज से पूरी तरह बचा जा सकता है?

प्री-डायबिटीज को कई मामलों में सामान्य ब्लड शुगर स्तर की ओर वापस लाया जा सकता है और टाइप-2 डायबिटीज का खतरा कम किया जा सकता है। लेकिन इसकी गारंटी नहीं दी जा सकती कि जीवनशैली में बदलाव करने से किसी व्यक्ति को कभी डायबिटीज नहीं होगी।

निष्कर्ष: प्री-डायबिटीज को नजरअंदाज करने के बजाय समय पर जांच कराना और स्वस्थ आदतें अपनाना जरूरी है। यदि आपकी उम्र अधिक है, वजन ज्यादा है या परिवार में डायबिटीज का इतिहास है, तो डॉक्टर से ब्लड शुगर जांच कराने के बारे में बात करें। शुरुआती कदम भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का जोखिम घटाने में मदद कर सकते हैं।

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