क्या AIMIM है BJP की ‘बी-टीम’? रामदेव के ओवैसी पर दावे के बीच समझें वोटों का पूरा गणित


 उत्तर प्रदेश की राजनीति में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) को लेकर एक बार फिर बहस तेज है। पार्टी पर अक्सर आरोप लगाया जाता है कि वह मुस्लिम बहुल सीटों पर समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस के वोट बांटकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) को फायदा पहुंचाती है। योग गुरु रामदेव के ओवैसी को लेकर किए गए दावे के बीच सवाल उठ रहा है कि क्या चुनावी आंकड़े इस आरोप की पुष्टि करते हैं या मामला इससे कहीं अधिक जटिल है?

2022 के चुनाव में AIMIM का प्रदर्शन कैसा रहा?

2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में AIMIM ने करीब 95 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन पार्टी एक भी सीट नहीं जीत सकी। उसे प्रदेशभर में लगभग 0.49 प्रतिशत वोट मिले। चुनाव में पार्टी का सीमित प्रदर्शन इस बात का संकेत था कि वह उस समय राज्य में बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित नहीं हो पाई थी। 

हालांकि, कुछ विधानसभा क्षेत्रों में AIMIM को मिले वोट और BJP तथा SP उम्मीदवारों के बीच जीत के अंतर ने राजनीतिक चर्चा को जन्म दिया। बिजनौर, नकुड़ और कुर्सी जैसी सीटों पर AIMIM के उम्मीदवारों को मिले वोट, SP उम्मीदवारों की हार के अंतर से अधिक थे। इसी आधार पर आरोप लगाया गया कि पार्टी की मौजूदगी से विपक्षी वोटों का बंटवारा हुआ और BJP को फायदा मिला। 

क्या आंकड़े साबित करते हैं कि AIMIM BJP की ‘बी-टीम’ है?

चुनावी आंकड़ों से यह जरूर पता चलता है कि कुछ सीटों पर AIMIM के वोटों की संख्या जीत के अंतर से अधिक थी। लेकिन केवल इस तुलना के आधार पर यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि AIMIM के मतदाता उसके उम्मीदवार के मैदान में नहीं होने पर SP या कांग्रेस को ही वोट देते। वे किसी अन्य दल को वोट दे सकते थे या मतदान से दूर भी रह सकते थे।

द क्विंट के 2022 के चुनावी विश्लेषण में पाया गया था कि BJP गठबंधन की जीत वाली सात सीटों पर AIMIM के वोट SP के मुकाबले महत्वपूर्ण हो सकते थे। वहीं, इसी विश्लेषण में BSP का प्रभाव AIMIM से अधिक सीटों पर देखा गया। इसलिए विपक्षी वोटों के बंटवारे की पूरी तस्वीर समझने के लिए सभी दलों के प्रदर्शन और स्थानीय समीकरणों को देखना जरूरी है। 

2027 के चुनाव के लिए ओवैसी की रणनीति

2027 के विधानसभा चुनाव से पहले AIMIM मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में अपनी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ाने और विपक्षी गठबंधन में हिस्सेदारी हासिल करने की कोशिश कर रही है। पार्टी का तर्क है कि मुस्लिम मतदाताओं के समर्थन के बावजूद उन्हें पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिलता। दूसरी ओर, SP और कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि विपक्षी वोटों का बंटवारा न हो।

राजनीतिक विश्लेषकों के बीच भी AIMIM के संभावित प्रभाव को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ का मानना है कि करीबी मुकाबलों में पार्टी के उम्मीदवार नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं, जबकि अन्य इसे प्रदेशव्यापी प्रभाव के बजाय कुछ चुनिंदा सीटों तक सीमित मानते हैं। 

निष्कर्ष: आरोप और चुनावी तथ्य अलग-अलग हैं

AIMIM को BJP की ‘बी-टीम’ कहना एक राजनीतिक आरोप है, स्थापित तथ्य नहीं। 2022 के नतीजे बताते हैं कि पार्टी कुछ सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों के लिए चुनौती बन सकती थी, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उसका उद्देश्य BJP को फायदा पहुंचाना था। 2027 में उसका वास्तविक प्रभाव उम्मीदवारों, गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और मतदाताओं के फैसलों पर निर्भर करेगा।

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