आतंकवाद को मानवता के खिलाफ अपराध घोषित करने की मांग: संयुक्त राष्ट्र में भारत ने उठाया मुद्दा, 2028 की संधि में क्या होगा?


 India on Terrorism at UN: भारत ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकवाद के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सख्त कानूनी व्यवस्था बनाने की मांग उठाई है। भारत का कहना है कि गंभीरता के निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले आतंकवादी अपराधों को मानवता के खिलाफ अपराधों से संबंधित प्रस्तावित अंतरराष्ट्रीय संधि में शामिल किया जाना चाहिए। भारत ने इस मुद्दे पर देशों की जिम्मेदारियों, उनके अधिकार क्षेत्र, आरोपियों के अधिकारों और पीड़ितों के हितों को भी महत्वपूर्ण बताया है। प्रस्तावित संधि को वर्ष 2028 में होने वाले सम्मेलन में अपनाने का लक्ष्य रखा गया है।

आतंकवाद को लेकर भारत की क्या मांग है?

भारत का जोर इस बात पर है कि आतंकवाद के गंभीर मामलों को अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत पर्याप्त महत्व दिया जाए। इसके लिए ऐसे आतंकवादी अपराधों को मानवता के खिलाफ अपराधों की प्रस्तावित संधि के दायरे में शामिल करने की मांग की गई है, जो निर्धारित गंभीरता के मानकों पर खरे उतरते हों।

भारत का मानना है कि आतंकवादी गतिविधियां केवल किसी एक देश की सुरक्षा के लिए खतरा नहीं हैं, बल्कि इनके प्रभाव व्यापक स्तर पर मानव जीवन और समाज पर पड़ सकते हैं। ऐसे अपराधों से निपटने के लिए देशों के बीच सहयोग और स्पष्ट कानूनी प्रावधान जरूरी हैं।

हालांकि, आतंकवाद के सभी मामलों को स्वतः मानवता के खिलाफ अपराध मानने के बजाय प्रस्तावित संधि में गंभीरता और कानूनी मानकों को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।

2028 की प्रस्तावित संधि में क्या होगा?

संयुक्त राष्ट्र में मानवता के खिलाफ अपराधों से संबंधित एक अंतरराष्ट्रीय संधि तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। इसका उद्देश्य ऐसे गंभीर अपराधों की रोकथाम, जांच और अभियोजन के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचे को मजबूत करना है।

भारत चाहता है कि इस प्रक्रिया में आतंकवाद के गंभीर मामलों को भी उचित स्थान मिले। वर्ष 2028 में होने वाले सम्मेलन में संधि को अपनाने का लक्ष्य है। हालांकि, अंतिम दस्तावेज में कौन-कौन से अपराध शामिल होंगे, यह सदस्य देशों के बीच होने वाली बातचीत और सहमति पर निर्भर करेगा।

देशों की जिम्मेदारी और अधिकार क्षेत्र पर जोर

भारत ने संधि तैयार करते समय देशों की जिम्मेदारियों और उनके अधिकार क्षेत्र से जुड़े पहलुओं को स्पष्ट रखने की जरूरत बताई है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अपराधों की जांच और आरोपियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करते समय देशों के बीच अधिकारों और दायित्वों को लेकर अस्पष्टता न रहे।

अंतरराष्ट्रीय सहयोग के दौरान यह भी तय करना महत्वपूर्ण होगा कि किस परिस्थिति में कोई देश जांच या अभियोजन की कार्रवाई कर सकता है। स्पष्ट नियम होने से कानूनी विवादों को कम करने और देशों के बीच सहयोग बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

आरोपियों के अधिकार और पीड़ितों के हित भी अहम

भारत ने इस बात पर भी जोर दिया है कि आतंकवाद के गंभीर मामलों में न्याय सुनिश्चित करते समय आरोपियों के कानूनी अधिकारों की रक्षा की जाए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ कार्रवाई स्थापित कानूनी प्रक्रिया और निष्पक्ष सुनवाई के सिद्धांतों के अनुरूप होनी चाहिए।

इसके साथ ही आतंकवादी घटनाओं से प्रभावित लोगों और पीड़ितों के हितों को भी पर्याप्त महत्व देने की जरूरत है। न्याय की प्रक्रिया में पीड़ितों की सुरक्षा, उनके अधिकारों और उचित सहायता जैसे पहलुओं पर ध्यान देना महत्वपूर्ण माना जाता है।

संप्रभुता और आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप का मुद्दा

भारत ने प्रस्तावित संधि में देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप न करने के सिद्धांतों का सम्मान करने की बात भी कही है। इसका अर्थ है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद के खिलाफ सहयोग बढ़ाते समय देशों की कानूनी और संवैधानिक व्यवस्थाओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।

कुल मिलाकर, भारत की मांग आतंकवाद के गंभीर मामलों के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग को मजबूत करने से जुड़ी है। अब इस प्रस्ताव पर सदस्य देशों के बीच होने वाली चर्चा महत्वपूर्ण होगी। वर्ष 2028 में प्रस्तावित सम्मेलन तक यह स्पष्ट होगा कि संधि के अंतिम प्रारूप में आतंकवाद से संबंधित प्रावधानों को किस रूप में शामिल किया जाता है।

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