भारत में अब इमरजेंसी लगाना कितना मुश्किल? 1975 के बाद कितनी बदली व्यवस्था, जानें संविधान के नियम


 National Emergency India: दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की घटनाओं ने विरोध के अधिकार, सरकारी शक्तियों और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर चर्चा तेज कर दी है। 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रदर्शन रोकने के लिए 2,000 से अधिक लोगों को हिरासत में लिए जाने की खबर आई थी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने वाले लोगों की अवैध हिरासत से बचने और सार्वजनिक परिवहन व इंटरनेट सेवाओं को सामान्य करने के निर्देश दिए।

ऐसे माहौल में सवाल उठता है कि क्या भारत में दोबारा राष्ट्रीय आपातकाल लगाया जा सकता है? क्या सरकार केवल विरोध प्रदर्शन या राजनीतिक अस्थिरता के आधार पर इमरजेंसी घोषित कर सकती है? इसका जवाब समझने के लिए संविधान के अनुच्छेद 352 और 1975 के आपातकाल के बाद किए गए बदलावों को जानना जरूरी है।

1. राष्ट्रीय आपातकाल कब लगाया जा सकता है?

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा केवल तब की जा सकती है, जब युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण भारत या उसके किसी हिस्से की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो। केवल राजनीतिक विरोध, सरकार के खिलाफ प्रदर्शन या प्रशासनिक असहमति अपने आप में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने का संवैधानिक आधार नहीं है।

2. 1975 के बाद क्या-क्या बदल गया?

भारत में 25 जून 1975 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार के दौरान राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया गया था। यह 21 मार्च 1977 तक लागू रहा। उस समय संविधान में आंतरिक अशांति के आधार पर भी आपातकाल लगाने का प्रावधान था।

1975-77 के अनुभवों के बाद 1978 में 44वां संविधान संशोधन किया गया। इसके तहत आपातकाल लगाने की प्रक्रिया में कई अहम सुरक्षा उपाय जोड़े गए।

कैबिनेट की लिखित सलाह जरूरी

प्रधानमंत्री अकेले राष्ट्रीय आपातकाल घोषित नहीं कर सकते। केंद्रीय मंत्रिमंडल का निर्णय राष्ट्रपति को लिखित रूप में भेजना आवश्यक है।

संसद की मंजूरी जरूरी

आपातकाल की घोषणा को एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलनी चाहिए। इसके लिए उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई समर्थन की जरूरत होती है।

हर छह महीने में समीक्षा

संसद की मंजूरी के बाद भी आपातकाल अनिश्चितकाल तक बिना समीक्षा के जारी नहीं रह सकता। इसे जारी रखने के लिए हर छह महीने में दोनों सदनों की मंजूरी आवश्यक है।

आंतरिक अशांति की जगह सशस्त्र विद्रोह

अब केवल आंतरिक अशांति का हवाला देकर राष्ट्रीय आपातकाल नहीं लगाया जा सकता। संविधान में इसके लिए सशस्त्र विद्रोह का आधार निर्धारित है।

स्रोत: भारतीय संविधान का अनुच्छेद 352 और 44वां संविधान संशोधन।

3. क्या इमरजेंसी लगने पर सभी मौलिक अधिकार खत्म हो जाते हैं?

नहीं। यह एक आम गलतफहमी है। राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी सभी मौलिक अधिकार अपने आप समाप्त नहीं हो जाते।

  • अनुच्छेद 358 के तहत अनुच्छेद 19 से संबंधित सुरक्षा पर विशेष प्रभाव केवल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित आपातकाल में पड़ता है, सशस्त्र विद्रोह के आधार पर नहीं।

  • अनुच्छेद 359 के तहत राष्ट्रपति कुछ मौलिक अधिकारों को लागू कराने के लिए अदालत जाने के अधिकार को निर्धारित सीमा तक निलंबित कर सकते हैं। लेकिन अनुच्छेद 20 और 21 के संरक्षण को निलंबित नहीं किया जा सकता।

इसलिए आपातकाल के दौरान अधिकारों पर पड़ने वाला प्रभाव उसके आधार, राष्ट्रपति के आदेश और संवैधानिक प्रावधानों पर निर्भर करता है।

4. क्या मौजूदा प्रदर्शनों के कारण इमरजेंसी लग सकती है?

दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ प्रदर्शन और हिरासत की घटनाएं अपने आप में राष्ट्रीय आपातकाल के लिए निर्धारित संवैधानिक शर्तों को पूरा नहीं करतीं। राष्ट्रीय आपातकाल और कानून-व्यवस्था से निपटने के लिए उठाए जाने वाले सामान्य प्रशासनिक कदम अलग-अलग संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने भी हालिया प्रदर्शन मामले में शांतिपूर्ण तरीके से एकत्र होने वाले लोगों की अवैध हिरासत से बचने और सार्वजनिक सेवाओं को सामान्य रखने पर जोर दिया है।

निष्कर्ष

भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लगाने की संवैधानिक शक्ति अब भी मौजूद है, लेकिन 1975 के बाद इसे अधिक कड़े नियमों और संसदीय निगरानी के अधीन किया गया है। कैबिनेट की लिखित सलाह, संसद की विशेष बहुमत से मंजूरी और सशस्त्र विद्रोह जैसी सीमित शर्तें इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय हैं।

इसलिए केवल विरोध प्रदर्शन, राजनीतिक विवाद या सरकार के खिलाफ नाराजगी के आधार पर राष्ट्रीय आपातकाल नहीं लगाया जा सकता। इसके लिए संविधान में निर्धारित गंभीर परिस्थितियों का होना जरूरी है।

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