देश में न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर कॉलेजियम प्रणाली एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया, उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में यह बहस तेज हो गई है कि उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों की मौजूदा व्यवस्था को किस तरह बेहतर और अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है।
भारत में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली की महत्वपूर्ण भूमिका है। इस व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम जजों का कॉलेजियम न्यायाधीशों की नियुक्ति और तबादले से जुड़े नामों पर विचार करता है। समर्थकों का मानना है कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता सुरक्षित रहती है, जबकि आलोचक प्रक्रिया में पर्याप्त पारदर्शिता और व्यापक जवाबदेही की कमी का मुद्दा उठाते हैं।
NJAC को क्यों लाया गया था?
कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से संसद ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की व्यवस्था लागू करने के लिए संविधान संशोधन किया था। इसका उद्देश्य जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया में न्यायपालिका के साथ-साथ सरकार और अन्य सदस्यों की भूमिका सुनिश्चित करना था।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने 2015 में NJAC से संबंधित संविधान संशोधन और कानून को असंवैधानिक ठहराते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की मूल संरचना को महत्वपूर्ण आधार माना। इसके बाद कॉलेजियम प्रणाली फिर से प्रभावी बनी रही।
अब सवाल है- आगे का रास्ता क्या?
NJAC के निरस्त होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता और जवाबदेही कैसे बढ़ाई जाए, जबकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी प्रभावित न हो। इसका समाधान कॉलेजियम प्रणाली को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उसकी कार्यप्रणाली में सुधार के रूप में तलाशा जा सकता है।
कॉलेजियम के फैसलों के कारणों को अधिक स्पष्ट रूप से सार्वजनिक करना, नियुक्तियों के लिए तय मानदंडों को बेहतर तरीके से सामने रखना और प्रक्रिया में समयबद्धता लाना संभावित सुधारों में शामिल हो सकता है।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता भी जरूरी
न्यायिक नियुक्तियों की व्यवस्था पर होने वाली बहस में एक महत्वपूर्ण पक्ष न्यायपालिका की स्वतंत्रता का भी है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अदालतों से निष्पक्ष और स्वतंत्र तरीके से काम करने की अपेक्षा की जाती है। इसलिए किसी भी नई नियुक्ति प्रणाली में पारदर्शिता बढ़ाने के साथ न्यायपालिका की स्वतंत्रता और संविधान की मूल संरचना की रक्षा करना आवश्यक होगा।
ऐसे में देशव्यापी बहस का उद्देश्य केवल कॉलेजियम या NJAC के पक्ष-विपक्ष तक सीमित नहीं रहना चाहिए। असली चुनौती ऐसी व्यवस्था तैयार करने की है, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, योग्यता और न्यायपालिका की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम हो सके।
.jpg)
0 टिप्पणियाँ