BRICS डिनर से बहस: भारत का 'असली खाना' क्या है, मांसाहार या शाकाहार?


 BRICS डिनर में परोसे गए भोजन को लेकर शुरू हुई चर्चा ने भारत की खान-पान परंपरा को लेकर एक पुरानी बहस फिर छेड़ दी है। सवाल उठ रहा है कि आखिर भारत का 'असली खाना' क्या है—शाकाहारी भोजन या मांसाहारी व्यंजन? भारत जैसे विविधता वाले देश में इसका कोई एक जवाब देना आसान नहीं है। यहां अलग-अलग क्षेत्रों, समुदायों और परंपराओं के अनुसार भोजन की आदतें सदियों से बदलती रही हैं।

भारत में मांसाहार की परंपरा काफी पुरानी मानी जाती है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक अध्ययनों से संकेत मिलते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता के लोग पशु उत्पादों का सेवन करते थे। समय के साथ भारतीय समाज के अलग-अलग हिस्सों में भोजन की पसंद और परंपराएं अलग-अलग रूप लेती गईं। कई समुदायों में मांस, मछली और अंडे भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बने रहे, जबकि कुछ परंपराओं में शाकाहार को विशेष महत्व मिला।

भारत में शाकाहार को मजबूत बनाने में बौद्ध और जैन परंपराओं की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। अहिंसा और जीवों के प्रति करुणा पर जोर देने वाली इन धार्मिक परंपराओं ने समाज के एक बड़े हिस्से की खान-पान की आदतों को प्रभावित किया। बाद के दौर में कई अन्य धार्मिक और सामाजिक परंपराओं ने भी शाकाहारी भोजन को अपनाया और बढ़ावा दिया।

मध्यकाल में भारत की रसोई पर बाहरी प्रभाव भी पड़ा। मुगल दौर के साथ कबाब, कोरमा, बिरयानी और कई तरह के मांसाहारी व्यंजनों ने भारतीय भोजन में अपनी जगह बनाई। हालांकि, इन व्यंजनों ने सिर्फ मांसाहारी भोजन को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि मसालों, पकाने की तकनीकों और शाही खान-पान की पूरी संस्कृति को समृद्ध किया।

इसी तरह पुर्तगाली प्रभाव से भी भारतीय खान-पान में कई महत्वपूर्ण बदलाव आए। मिर्च और आलू जैसी चीजें भारत में बाहर से आईं, लेकिन बाद में वे भारतीय रसोई का अभिन्न हिस्सा बन गईं। आज भारतीय भोजन की कल्पना कई ऐसे व्यंजनों के बिना करना मुश्किल है, जिनमें इन सामग्रियों का इस्तेमाल होता है।

ब्रिटिश दौर में चाय, ब्रेड और बेकरी से जुड़े कई खाद्य पदार्थ भारतीय खान-पान का हिस्सा बने। भारत ने इन बाहरी प्रभावों को केवल अपनाया ही नहीं, बल्कि उन्हें अपनी स्थानीय परंपराओं के अनुसार ढालकर नए स्वाद भी विकसित किए।

इसलिए भारत के 'असली खाने' को केवल शाकाहार या मांसाहार के दायरे में बांधना सही नहीं होगा। भारतीय भोजन की असली पहचान उसकी विविधता और लगातार बदलती परंपरा में है। BRICS डिनर को लेकर उठी बहस भी इसी व्यापक खाद्य संस्कृति की ओर ध्यान खींचती है, जहां अलग-अलग दौर और संस्कृतियों ने मिलकर आज की भारतीय थाली को आकार दिया है।

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