भारत की मेजबानी में हो रहा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन ऐसे समय में आयोजित किया जा रहा है, जब दुनिया तेजी से बदलते भू-राजनीतिक समीकरणों से गुजर रही है। सम्मेलन से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ हुई बातचीत और अन्य देशों के नेताओं के साथ भारत के बढ़ते संवाद ने इस मंच की अहमियत और बढ़ा दी है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि नेताओं के बीच दिखाई दे रही गर्मजोशी क्या ब्रिक्स के साझा एजेंडे में भी तालमेल में बदल पाएगी?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और व्लादिमीर पुतिन के बीच हुई करीब 40 मिनट की बातचीत में द्विपक्षीय संबंधों के साथ कई क्षेत्रीय और वैश्विक मुद्दों पर चर्चा हुई। पश्चिम एशिया और काला सागर क्षेत्र के संघर्षों से लेकर समुद्री व्यापार और भारतीय नाविकों की सुरक्षा तक कई विषयों पर दोनों नेताओं ने विचार साझा किए। भारत ने बातचीत और कूटनीति को संघर्षों के समाधान का बेहतर रास्ता बताया है।
दोनों देशों ने अपनी विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने पर सहमति जताई। वहीं, पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी को रूस में होने वाले 24वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया, जिसे मोदी ने स्वीकार कर लिया है। हालांकि, इसकी तारीख अभी तय नहीं हुई है।
इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी की ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियन के साथ बैठक भी महत्वपूर्ण रही। इन मुलाकातों से यह संकेत मिलता है कि भारत बदलते वैश्विक समीकरणों के बीच अपने अलग-अलग साझेदारों के साथ संबंध बनाए रखते हुए संतुलित विदेश नीति पर आगे बढ़ना चाहता है।
BRICS के सामने सबसे बड़ी चुनौती
ब्रिक्स की ताकत उसके सदस्य देशों की आर्थिक और राजनीतिक विविधता में है, लेकिन यही विविधता उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती भी पैदा करती है। अलग-अलग देशों के हित, रणनीतिक प्राथमिकताएं और वैश्विक मुद्दों पर मतभेद होने के बावजूद साझा एजेंडे पर सहमति बनाना आसान नहीं है।
भारत मंडपम में आयोजित ब्रिक्स बिजनेस फोरम में वैश्विक नेताओं की भागीदारी ने आर्थिक और कारोबारी सहयोग की संभावनाओं को मजबूत किया है। अब उम्मीद है कि इसी तरह का तालमेल शिखर सम्मेलन के राजनीतिक और रणनीतिक एजेंडे में भी दिखाई देगा।
अगर भारत सदस्य देशों के बीच मतभेदों के बावजूद साझा मुद्दों पर सहमति बनाने में सफल रहता है, तो ब्रिक्स वैश्विक दक्षिण की आवाज को और मजबूत करने वाला प्रभावी मंच बन सकता है। यही भारत की कूटनीति के लिए सबसे बड़ी परीक्षा भी होगी।
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