दवा की कीमत तय होने से लूट तक पूरा खेल! सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद क्या बदलेगा?


 दवाओं की कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने हालिया सुनवाई में बेहद अहम सवाल उठाए हैं। अदालत ने खासतौर पर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों की दवाओं पर मरीजों से अत्यधिक कीमत वसूले जाने पर चिंता जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने ऐसे मामलों को गंभीर समस्या बताते हुए दवाओं की कीमत और अस्पतालों की बिक्री व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत पर जोर दिया। केंद्र सरकार ने भी अदालत के सामने माना कि दवाओं की अत्यधिक कीमतों से जुड़ी समस्या पर कदम उठाने की जरूरत है।

दवा की कीमत तय कैसे होती है?

भारत में दवाओं की कीमतों का नियमन Drugs (Prices Control) Order यानी DPCO, 2013 के तहत होता है। इसकी निगरानी National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) करती है। जरूरी दवाओं की सूची में शामिल दवाओं के लिए NPPA अधिकतम कीमत यानी सीलिंग प्राइस तय करती है। इसके अलावा कुछ नई दवाओं की खुदरा कीमत भी NPPA निर्धारित करती है।

NPPA के मुताबिक, निर्धारित दवाओं की सीलिंग प्राइस निकालने में औसत Price to Retailer (PTR) पर 16 प्रतिशत मार्जिन जोड़ा जाता है। जून 2026 तक NPPA ने 935 फॉर्मुलेशन के सीलिंग प्राइस तय किए थे।

असली सवाल गैर-शेड्यूल दवाओं का

दवा कीमतों पर बहस का एक बड़ा हिस्सा उन दवाओं से जुड़ा है जो DPCO की शेड्यूल सूची में शामिल नहीं हैं। सरकार के अनुसार, गैर-शेड्यूल दवाओं के निर्माता 12 महीने की अवधि में MRP में 10 प्रतिशत से अधिक बढ़ोतरी नहीं कर सकते। हालांकि, नई दवा बाजार में किस शुरुआती MRP पर आती है, इस व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में सवाल उठे हैं।

यही वह बिंदु है जहां दवा की कीमत, निर्माता से लेकर अस्पताल और मरीज तक पहुंचने के दौरान अलग-अलग स्तरों पर बढ़ सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने अस्पतालों द्वारा मरीजों को अपनी ही फार्मेसी से दवा खरीदने के लिए बाध्य किए जाने के मुद्दे पर भी केंद्र से विचार करने को कहा है।

सुप्रीम कोर्ट के रुख के बाद क्या बदल सकता है?

अदालत ने सभी दवाओं पर एक समान 16 प्रतिशत मार्जिन की संभावना पर भी चर्चा की है, लेकिन यह अभी कोई अंतिम लागू नियम नहीं है। केंद्र सरकार से इस विषय पर जवाब और आगे की कार्रवाई की जानकारी मांगी गई है। इसलिए फिलहाल इसे प्रस्तावित दिशा या न्यायिक चिंता के तौर पर देखना चाहिए, न कि बदली हुई कीमत व्यवस्था के रूप में।

आगे सरकार की ओर से उठाए जाने वाले कदम यह तय कर सकते हैं कि दवाओं की शुरुआती कीमत, अस्पतालों की फार्मेसी और मरीजों से वसूली जाने वाली अंतिम कीमत के बीच अंतर को किस तरह नियंत्रित किया जाएगा। इसका सीधा असर महंगी और लंबे इलाज वाली बीमारियों के मरीजों पर पड़ सकता है।

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