राहत: भारत में टीबी के इलाज को लेकर बड़ी खबर, फेफड़ों में छिपे बैक्टीरिया पर सीधे अटैक करेगी दवा


 भारत में टीबी के इलाज को ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए फेफड़ों तक सीधे दवा पहुंचाने की एक नई रणनीति पर काम किया जा रहा है। CSIR-केंद्रीय औषधि अनुसंधान संस्थान (CSIR-CDRI) से जुड़ी शोध टीम ने रिफाब्यूटिन और आइसोनियाजिड को इनहेल करने योग्य ड्राई पाउडर के रूप में पहुंचाने पर शोध किया है। इसका उद्देश्य दवा को सीधे फेफड़ों तक पहुंचाकर वहां मौजूद Mycobacterium tuberculosis पर प्रभाव डालना है। CSIR-CDRI की मौजूदा पाइपलाइन में इस प्रोजेक्ट को 'Centinhale' के नाम से रिफाब्यूटिन और आइसोनियाजिड की ड्राई पाउडर फॉर्मुलेशन के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।

क्यों खास है फेफड़ों तक सीधे दवा पहुंचाना?

टीबी मुख्य रूप से फेफड़ों को प्रभावित करने वाली बीमारी है। मौजूदा इलाज में मरीजों को दवाएं आमतौर पर मुंह के जरिए दी जाती हैं। शोधकर्ताओं का तर्क है कि अगर दवा को सांस के जरिए सीधे फेफड़ों तक पहुंचाया जाए तो प्रभावित हिस्से में दवा की स्थानीय उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है।

शोध में ऐसी माइक्रोपार्टिकल्स विकसित की गई हैं, जिन्हें सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचाने का लक्ष्य है। ये कण फेफड़ों के मैक्रोफेज तक पहुंच सकते हैं। मैक्रोफेज ऐसी प्रतिरक्षा कोशिकाएं हैं जिनके भीतर टीबी के बैक्टीरिया मौजूद रह सकते हैं।

रिफाब्यूटिन और आइसोनियाजिड का संयोजन

इस शोध में रिफाब्यूटिन और आइसोनियाजिड को बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर आधारित कणों में शामिल किया गया। प्रकाशित प्री-क्लिनिकल अध्ययन में चूहों और गिनी पिग्स में इस इनहेल्ड फॉर्मुलेशन का परीक्षण किया गया। अध्ययन में इसे मौजूदा ओरल एंटी-टीबी उपचार के साथ सहायक उपचार के तौर पर इस्तेमाल किया गया था।

शोधकर्ताओं ने बताया कि प्रयोग में फेफड़ों और अन्य संबंधित ऊतकों में बैक्टीरियल लोड में कमी देखी गई। कुछ पशु मॉडलों में इलाज बंद करने के बाद दोबारा संक्रमण न होने के संकेत भी मिले। हालांकि, ये परिणाम जानवरों में हुए प्री-क्लिनिकल परीक्षणों से जुड़े हैं और इन्हें सीधे इंसानों में इलाज की सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता।

क्या इंसानों में शुरू होगा परीक्षण?

इस तकनीक का अगला महत्वपूर्ण चरण मानव परीक्षण है। किसी नई दवा या फॉर्मुलेशन को मरीजों के लिए उपलब्ध कराने से पहले उसकी सुरक्षा, सही खुराक, सहनशीलता और प्रभावशीलता का इंसानों में परीक्षण जरूरी होता है। CSIR-CDRI की आधिकारिक पाइपलाइन में Centinhale को अभी MDR-TB के लिए Novel Formulations के तहत सूचीबद्ध किया गया है।

इसलिए फिलहाल इसे टीबी के मरीजों के लिए उपलब्ध नई दवा समझना सही नहीं होगा। मानव परीक्षणों से मिलने वाले परिणाम यह तय करने में महत्वपूर्ण होंगे कि यह फॉर्मुलेशन भविष्य में मानक इलाज के साथ किस तरह इस्तेमाल किया जा सकता है।

इलाज में क्या बदल सकता है?

अगर भविष्य के क्लिनिकल परीक्षणों में यह तरीका सुरक्षित और प्रभावी साबित होता है, तो फेफड़ों तक सीधे दवा पहुंचाने की रणनीति टीबी उपचार में एक अतिरिक्त विकल्प बन सकती है। इसका संभावित उद्देश्य कम मात्रा में दवा को सीधे संक्रमण वाली जगह तक पहुंचाना और मौजूदा उपचार के साथ मिलकर बैक्टीरिया पर बेहतर असर डालना है।

फिलहाल इस दिशा में मिले परिणाम उत्साहजनक शोध संकेत हैं, लेकिन अंतिम निष्कर्ष मानव परीक्षणों के बाद ही निकाला जा सकेगा। टीबी के मरीजों को मौजूदा डॉक्टर द्वारा बताए गए उपचार को अपने स्तर पर बंद या बदलना नहीं चाहिए।

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ