श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर में एक अनोखी धार्मिक परंपरा निभाई जाती है। इस विशेष आयोजन के कारण मंदिर में करीब पांच घंटे तक आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन बंद रहेंगे। जन्माष्टमी पर होने वाली यह परंपरा भगवान जगन्नाथ और श्रीकृष्ण के संबंध से जुड़ी हुई है और इसका धार्मिक महत्व बेहद खास माना जाता है।
जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव को देशभर में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। पुरी के जगन्नाथ मंदिर में भी इस अवसर पर विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। इसी दौरान भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण की माता के स्वरूप में मानकर एक विशेष परंपरा निभाई जाती है।
भगवान जगन्नाथ क्यों निभाते हैं मां की भूमिका?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ को भगवान श्रीकृष्ण के ही एक स्वरूप के रूप में पूजा जाता है। जन्माष्टमी के अवसर पर जगन्नाथ मंदिर में भगवान जगन्नाथ को श्रीकृष्ण की जन्मदात्री माता के भाव से पूजा जाता है। इसी वजह से इस दिन होने वाले कुछ अनुष्ठानों में भगवान जगन्नाथ की मातृ भूमिका विशेष रूप से दिखाई देती है।
यह परंपरा वैष्णव धार्मिक मान्यताओं और पुरी की विशिष्ट पूजा पद्धति से जुड़ी हुई है। जन्माष्टमी के दौरान भगवान श्रीकृष्ण के जन्म का उत्सव मनाते समय मंदिर में कई विशेष सेवाएं और अनुष्ठान संपन्न किए जाते हैं।
क्या है जेउता भोग?
जन्माष्टमी के अवसर पर जगन्नाथ मंदिर में जेउता भोग से जुड़ी विशेष परंपरा भी निभाई जाती है। इस दौरान भगवान जगन्नाथ को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। इसे श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव से जोड़कर देखा जाता है।
मंदिर की परंपराओं के अनुसार, जन्माष्टमी से जुड़े अनुष्ठानों में भगवान के बाल स्वरूप और मातृ भाव का विशेष महत्व रहता है। इसी कारण इस दिन की पूजा सामान्य दिनों से अलग होती है।
पांच घंटे क्यों बंद रहेगा मंदिर?
जन्माष्टमी के अवसर पर होने वाले विशेष धार्मिक अनुष्ठानों और पूजा-विधि के कारण मंदिर के कुछ समय के लिए आम दर्शन बंद रखे जाते हैं। इस दौरान मंदिर की निर्धारित परंपराओं के अनुसार सेवायत विशेष पूजा और अनुष्ठान संपन्न करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए यह परंपरा इसलिए भी खास है क्योंकि इसमें भगवान जगन्नाथ को केवल श्रीकृष्ण के स्वरूप में ही नहीं, बल्कि मातृ भाव से भी जोड़ा जाता है। पुरी की यह अनूठी धार्मिक परंपरा जन्माष्टमी के पर्व को और विशेष बना देती है।
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