एथलेटिक्स का सपना टूटा, आर्थिक मुश्किलें आईं, फिर भी नहीं मानी हार; एशियाड में कमलजीत ने जीता सोना


 हरियाणा के रेवाड़ी के एक गांव से निकलकर कमलजीत सिंह ने खेल की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनका पहला सपना एथलीट बनने का था, लेकिन एक गंभीर चोट ने उनके ट्रैक करियर पर विराम लगा दिया। इसके बाद उन्होंने हार मानने के बजाय खेल का दूसरा रास्ता चुना और शूटिंग में किस्मत आजमाई। संघर्षों से भरे इस सफर का सबसे बड़ा पड़ाव एशियाड बना, जहां आखिरी समय पर मिले मौके को उन्होंने स्वर्ण पदक और एशियन रिकॉर्ड में बदल दिया।

चोट ने बदला करियर

कमलजीत शुरुआत से ही एथलेटिक्स में अपना भविष्य बनाना चाहते थे। वह ट्रैक पर मेहनत कर रहे थे और एक एथलीट के तौर पर आगे बढ़ने का सपना देख रहे थे। लेकिन 2019 में लगी गंभीर चोट ने उनके इस सपने को झटका दिया। चोट के बाद ट्रैक पर करियर आगे बढ़ाना मुश्किल हो गया और उन्हें अपने खेल का रास्ता बदलना पड़ा।

15 साल की उम्र में थामी बंदूक

एथलेटिक्स से दूर होने के बाद कमलजीत ने महज 15 साल की उम्र में शूटिंग का रुख किया। नया खेल उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने इसे सीखने और खुद को साबित करने के लिए लगातार मेहनत की। धीरे-धीरे शूटिंग उनके करियर का नया आधार बन गई।

इस दौरान परिवार का सहयोग उनके लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा। आर्थिक परेशानियों के बावजूद परिवार ने उनके खेल के सपने को टूटने नहीं दिया। सीमित संसाधनों के बीच कमलजीत ने अभ्यास जारी रखा और प्रतियोगिताओं में बेहतर प्रदर्शन करने की कोशिश की।

आखिरी समय पर मिला मौका

एशियाड में कमलजीत के लिए परिस्थितियां उस समय बदलीं, जब उन्हें आखिरी समय पर प्रतियोगिता में मौका मिला। ऐसे समय में जब दबाव काफी ज्यादा था, उन्होंने अपने प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित किया और मिले अवसर को शानदार उपलब्धि में बदल दिया।

उन्होंने एशियाड में स्वर्ण पदक जीतने के साथ एशियन रिकॉर्ड भी बनाया। यह उपलब्धि उनके लिए इसलिए भी खास रही क्योंकि कुछ साल पहले ही चोट ने उनके एथलेटिक्स करियर को रोक दिया था।

संघर्ष से सफलता तक का सफर

कमलजीत सिंह की कहानी इस बात की मिसाल है कि खेल में करियर की राह हमेशा सीधी नहीं होती। चोट, आर्थिक चुनौतियों और अनिश्चितताओं के बावजूद उन्होंने अपना लक्ष्य नहीं छोड़ा। एथलेटिक्स का सपना पूरा नहीं हो सका तो उन्होंने शूटिंग को चुना और इसी खेल में अपनी मेहनत से नई पहचान बनाई।

एशियाड का स्वर्ण और एशियन रिकॉर्ड उनके उस संघर्ष का परिणाम है, जिसमें परिवार का साथ और खुद पर विश्वास लगातार बना रहा।

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