इबोला का बढ़ता खतरा: कांगो में 6 हजार से ज्यादा मामले, 3 हजार मौतें; आखिर क्यों नहीं थम रहा संक्रमण?


 अफ्रीकी देश डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो (DRC) में इबोला वायरस का प्रकोप लगातार गंभीर होता जा रहा है। 1 सितंबर तक देश में 6,186 से ज्यादा पुष्ट मामले सामने आ चुके हैं और 3,000 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। मौजूदा प्रकोप को कांगो के इतिहास का सबसे घातक इबोला प्रकोप बताया जा रहा है। विशेषज्ञों की चिंता इसलिए भी बढ़ी हुई है क्योंकि संक्रमण को रोकने के लिए निगरानी, जांच और इलाज की व्यवस्था में सुधार के बावजूद वायरस का प्रसार पूरी तरह नहीं रुक पाया है।

कांगो में इस बार का इबोला प्रकोप आधिकारिक तौर पर 15 मई 2026 को घोषित किया गया था। यह देश में इबोला का 17वां प्रकोप है। इससे पहले 2018 से 2020 के बीच आए बड़े प्रकोप में 3,481 मामले सामने आए थे और 2,299 लोगों की मौत हुई थी। मौजूदा संकट में मृतकों की संख्या उस आंकड़े को भी पार कर चुकी है।

बुंडिबुग्यो स्ट्रेन ने बढ़ाई चुनौती

मौजूदा संक्रमण के पीछे बुंडिबुग्यो स्ट्रेन को प्रमुख कारण माना जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक इस वायरस के खिलाफ अभी कोई लाइसेंस प्राप्त वैक्सीन या विशेष उपचार उपलब्ध नहीं है। यही वजह है कि संक्रमण की रोकथाम के लिए शुरुआती पहचान, मरीजों की निगरानी और स्थानीय स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

आखिर कहां हो रही है सबसे बड़ी परेशानी?

कांगो के कई प्रभावित इलाके बेहद दुर्गम हैं। खराब सड़कें, बारिश और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के कारण स्वास्थ्यकर्मियों के लिए गांवों तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। इसका असर संक्रमित लोगों की पहचान, जांच के लिए सैंपल पहुंचाने और समय पर इलाज शुरू करने पर पड़ता है।

इसके अलावा प्रभावित इलाकों से लोगों की लगातार आवाजाही भी संक्रमण को नियंत्रित करने में बाधा बन रही है। खनन क्षेत्रों में काम करने वाले लोगों के स्थान बदलने से संक्रमित लोगों की पहचान और संपर्कों की निगरानी मुश्किल हो जाती है। स्वास्थ्य व्यवस्था पर लोगों का कम भरोसा और सामुदायिक भागीदारी की कमी भी समस्या को बढ़ा रही है।

संक्रमण की रफ्तार घटी, लेकिन खतरा बरकरार

राहत की बात यह है कि संक्रमण फैलने की दर में मई की तुलना में काफी कमी आई है। उस समय एक संक्रमित व्यक्ति से औसतन करीब चार लोगों के संक्रमित होने का अनुमान था, जबकि अब यह दर एक से थोड़ी अधिक रह गई है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इसे नियंत्रण का संकेत मानकर लापरवाही नहीं की जा सकती।

अब सबसे ज्यादा जोर स्थानीय समुदायों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने, निगरानी मजबूत करने और टीकाकरण व उपचार से जुड़े वैज्ञानिक प्रयासों को तेज करने पर है। अगर इन मोर्चों पर लापरवाही हुई, तो मौजूदा प्रकोप और गंभीर रूप ले सकता है।

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