महाराष्ट्र में बारिश का मौसम बीतने के बावजूद कई इलाकों में सूखे का संकट बना हुआ है। राज्य में कम बारिश का असर खेती और किसानों की आय पर दिखाई दे रहा है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, महाराष्ट्र के 358 तालुकों में से 265 को सूखाग्रस्त घोषित किया गया है। यानी राज्य के करीब 74 प्रतिशत तालुका सूखे की चपेट में हैं। ऐसे में किसानों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
बारिश में 18.8 फीसदी की कमी
महाराष्ट्र में इस साल बारिश सामान्य से कम दर्ज की गई है। राज्य में बारिश में करीब 18.8 प्रतिशत की कमी बताई जा रही है। इसका सीधा असर खरीफ फसलों पर पड़ा है। पर्याप्त बारिश नहीं होने के कारण कई क्षेत्रों में फसलों की बढ़वार प्रभावित हुई, जबकि कुछ इलाकों में उत्पादन में कमी की आशंका है।
किसानों के सामने एक ओर पानी की कमी की समस्या है तो दूसरी तरफ फसल की लागत निकालने की चिंता भी बढ़ गई है। जिन किसानों ने खरीफ सीजन में बुआई की थी, उन्हें अब मौसम की मार के कारण आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
265 तालुकों में सूखे का असर
राज्य में 358 तालुकों में से 265 को सूखाग्रस्त घोषित किए जाने से स्थिति की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इन क्षेत्रों में कम बारिश के कारण खेती के लिए पर्याप्त पानी उपलब्ध नहीं हो पाया है। कई स्थानों पर जलस्रोतों और भूजल स्तर पर भी इसका असर देखने को मिल रहा है।
सूखे की स्थिति का प्रभाव केवल फसलों तक सीमित नहीं रहता। ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालन, पेयजल और रोजमर्रा की जरूरतों पर भी इसका असर पड़ सकता है। ऐसे में प्रभावित क्षेत्रों के किसानों और ग्रामीण परिवारों के लिए सरकारी राहत महत्वपूर्ण हो जाती है।
फसल बर्बादी से किसान परेशान
कम बारिश के कारण खरीफ फसलों को नुकसान होने से किसानों ने मुआवजे की मांग उठाई है। किसानों का कहना है कि मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उनकी मेहनत और खेती पर किया गया खर्च प्रभावित हुआ है। ऐसे में फसल नुकसान का उचित आकलन कर जल्द राहत उपलब्ध कराई जानी चाहिए।
सरकार कराएगी फसल नुकसान का सर्वे
किसानों की स्थिति को देखते हुए सरकार जल्द फसल नुकसान का सर्वे कराने की तैयारी में है। सर्वे के जरिए यह पता लगाया जाएगा कि कम बारिश और सूखे के कारण अलग-अलग क्षेत्रों में फसलों को कितना नुकसान हुआ है। इसके आधार पर प्रभावित किसानों को राहत और मुआवजे से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।
महाराष्ट्र में यह स्थिति बताती है कि केवल बारिश होना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका क्षेत्रवार वितरण और खेती के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी उपलब्ध होना भी महत्वपूर्ण है। अब किसानों की नजर सरकार के सर्वे और उसके बाद मिलने वाली राहत पर टिकी है।
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