हिमाचल में मानसून से 3,500 करोड़ का नुकसान, केंद्र से मुआवजे की मांग; आज पहुंचेगी केंद्रीय टीम


 हिमाचल प्रदेश में इस साल मानसून के दौरान भारी बारिश, बादल फटने, अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन ने बड़े पैमाने पर तबाही मचाई है। राज्य सरकार के शुरुआती आकलन के मुताबिक, मानसून से जुड़ी प्राकृतिक आपदाओं के कारण प्रदेश में करीब 3,500 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। सरकार ने केंद्र से प्रभावित क्षेत्रों के लिए राहत और मुआवजे की मांग की है। नुकसान का आकलन करने और जमीनी स्थिति का जायजा लेने के लिए अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम 28 सितंबर से हिमाचल प्रदेश के दौरे पर पहुंचेगी।

केंद्रीय टीम अपने चार दिवसीय दौरे के दौरान प्रदेश के कई प्रभावित जिलों का निरीक्षण करेगी। इसमें चंबा, कांगड़ा, कुल्लू, मंडी, शिमला और सोलन समेत अन्य आपदा प्रभावित क्षेत्र शामिल हैं। टीम इन इलाकों में बारिश, बाढ़, बादल फटने और भूस्खलन से हुए नुकसान का मौके पर जाकर आकलन करेगी। इसके आधार पर केंद्र सरकार को रिपोर्ट सौंपे जाने की उम्मीद है।

प्रदेश में मानसून के दौरान कई इलाकों में अचानक आई बाढ़ और भूस्खलन के कारण सड़कें, पुल, मकान और दूसरी सार्वजनिक एवं निजी संपत्तियां प्रभावित हुई हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार बारिश के कारण कई स्थानों पर यातायात व्यवस्था भी बाधित हुई। कई जगहों पर संपर्क मार्ग क्षतिग्रस्त होने से लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। इसके अलावा कृषि और बागवानी क्षेत्र को भी नुकसान पहुंचने की जानकारी सामने आई है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, हिमाचल प्रदेश में बारिश से जुड़ी विभिन्न घटनाओं में अब तक 366 लोगों की मौत हो चुकी है। बड़ी संख्या में लोग घायल भी हुए हैं। प्राकृतिक आपदाओं के कारण कई परिवारों को अपने घर और आजीविका से हाथ धोना पड़ा है।

राज्य सरकार का कहना है कि आपदा से हुए बड़े नुकसान के बाद प्रभावित लोगों को राहत पहुंचाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय सहायता की जरूरत है। इसी उद्देश्य से केंद्र से राहत पैकेज और मुआवजे की मांग की गई है। अब केंद्रीय टीम के दौरे पर सभी की नजरें टिकी हैं। टीम के आकलन और रिपोर्ट के आधार पर केंद्र से मिलने वाली संभावित सहायता को लेकर आगे की प्रक्रिया तय की जाएगी।

मानसून के दौरान हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक आपदाओं की चुनौती लगातार बनी रही। ऐसे में केंद्रीय टीम का दौरा नुकसान की वास्तविक स्थिति सामने लाने और प्रभावित क्षेत्रों के लिए आवश्यक राहत एवं पुनर्वास सहायता तय करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

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