पिता ने पहलवान बनाने का देखा सपना, चोट ने बदली राह; 13 साल की उम्र में सुरुचि ने थामी पिस्टल


 हरियाणा के झज्जर की युवा निशानेबाज सुरुचि इंदर सिंह की कहानी संघर्ष, मेहनत और दृढ़ संकल्प की मिसाल है। कभी उनके पिता उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे, लेकिन एक चोट ने उनका रास्ता बदल दिया। जिस अखाड़े में उनके लिए भविष्य की कल्पना की गई थी, वहां से निकलकर सुरुचि ने शूटिंग रेंज का रुख किया और आगे चलकर अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का नाम रोशन किया।

पहलवानी का सपना चोट से टूटा

सुरुचि के पिता चाहते थे कि बेटी पहलवान बने और खेल की दुनिया में अपनी पहचान बनाए। उन्होंने इसके लिए शुरुआत भी की, लेकिन करीब तीन महीने के भीतर ही सुरुचि को कॉलरबोन में चोट लग गई। इस चोट के कारण पहलवानी का सफर आगे नहीं बढ़ सका और परिवार को दूसरा रास्ता तलाशना पड़ा।

इसी दौरान 13 साल की उम्र में सुरुचि ने शूटिंग शुरू की। पिस्टल शूटिंग से उन्हें धीरे-धीरे लगाव होने लगा और उन्होंने इसे अपना लक्ष्य बना लिया।

पिता ने कर्ज लेकर खरीदी पिस्टल

सुरुचि के इस नए सफर में उनके पिता ने भी पूरा साथ दिया। शूटिंग महंगा खेल होने के बावजूद उन्होंने बेटी की प्रतिभा और मेहनत पर भरोसा किया। बताया जाता है कि उन्होंने कर्ज लेकर सुरुचि के लिए पिस्टल खरीदी, ताकि अभ्यास में किसी तरह की कमी न रहे।

कोरोना महामारी के दौरान जब बाहर जाकर प्रशिक्षण लेना मुश्किल था, तब परिवार ने घर पर ही शूटिंग अभ्यास की व्यवस्था करने की कोशिश की। इसके लिए घर में ही एक रेंज तैयार की गई, जहां सुरुचि नियमित अभ्यास कर सकें।

मेहनत ने बदली जिंदगी

सुरुचि ने लगातार अभ्यास और मेहनत के दम पर अपनी पहचान बनाई। शुरुआती मुश्किलों के बावजूद उन्होंने निशानेबाजी में अपना स्तर लगातार बेहतर किया। परिवार के सहयोग और उनके समर्पण ने उन्हें राष्ट्रीय और फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक पहुंचाया।

उनकी मेहनत का बड़ा परिणाम तब सामने आया, जब उन्होंने एशियाई खेलों (एशियाड) में स्वर्ण पदक जीतकर रिकॉर्ड बनाया। जिस बेटी के लिए कभी अखाड़े का सपना देखा गया था, उसने पिस्टल थामकर शूटिंग की दुनिया में अपनी अलग पहचान बना ली।

चोट ने बदली राह, मंजिल नहीं

सुरुचि की कहानी बताती है कि करियर की राह में आने वाली मुश्किलें हमेशा मंजिल तय नहीं करतीं। पहलवानी से शूटिंग तक का उनका सफर परिवार के विश्वास और लगातार मेहनत की कहानी है। 13 साल की उम्र में शुरू हुआ यह सफर आगे चलकर उन्हें एशियाड के स्वर्ण पदक तक ले गया।

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