रूस ने भारत के सामने क्यों रखा ब्रिक्स का विचार? 11 साल बाद कैसे बना BRIC समूह


 12 सितंबर से नई दिल्ली में शुरू होने जा रहे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के बीच इस संगठन के इतिहास को जानना भी दिलचस्प है। आज BRICS दुनिया के प्रभावशाली उभरते देशों का एक प्रमुख मंच है, लेकिन इसकी नींव अचानक नहीं पड़ी थी। इसके पीछे 1990 के दशक के अंत से चल रही बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की सोच, रूस-भारत-चीन सहयोग और बाद में अमेरिकी अर्थशास्त्री जिम ओ'नील की आर्थिक थ्योरी की अहम भूमिका रही।

1998 में रूस ने भारत के सामने रखा था विचार

ब्रिक्स की राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझने के लिए 1998 का दौर महत्वपूर्ण है। उस समय रूस के विदेश मंत्री येवगेनी प्रिमाकोव ने भारत यात्रा के दौरान रूस, भारत और चीन के बीच सहयोग को मजबूत करने की दिशा में विचार रखा था। इसका व्यापक उद्देश्य वैश्विक व्यवस्था को अधिक बहुध्रुवीय बनाना और प्रमुख शक्तियों के बीच संतुलन स्थापित करना था। आगे चलकर रूस-भारत-चीन यानी RIC का मंच इसी सोच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

जिम ओ'नील की थ्योरी ने दिया BRIC नाम

इसके कुछ साल बाद वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने अपनी चर्चित रिपोर्ट ‘Building Better Global Economic BRICs’ में BRIC शब्द का इस्तेमाल किया। उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन को ऐसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के रूप में देखा, जिनकी आर्थिक ताकत आने वाले दशकों में वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित कर सकती है।

यानी रूस की राजनीतिक सोच और ओ'नील की आर्थिक अवधारणा अलग-अलग रास्तों से आगे बढ़ीं, लेकिन दोनों ने मिलकर आगे चलकर BRIC समूह के लिए जमीन तैयार की।

2006 में शुरू हुई औपचारिक प्रक्रिया

BRIC देशों के विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक 2006 में न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान हुई। इसके बाद चारों देशों के बीच उच्चस्तरीय संवाद बढ़ता गया। आखिरकार 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में BRIC का पहला शिखर सम्मेलन हुआ। इसमें ब्राजील, रूस, भारत और चीन के राष्ट्राध्यक्ष शामिल हुए।

इस तरह 1998 में सामने आई बहुध्रुवीय सहयोग की सोच से लेकर 2009 के पहले शिखर सम्मेलन तक करीब 11 साल का सफर पूरा हुआ।

फिर BRIC से बना BRICS

दक्षिण अफ्रीका को शामिल करने के फैसले के बाद 2011 में समूह का पहला पांच सदस्यीय BRICS शिखर सम्मेलन हुआ और BRIC का नाम BRICS हो गया। इसके बाद समूह का विस्तार लगातार जारी रहा और आज यह पहले की तुलना में कहीं अधिक व्यापक वैश्विक मंच बन चुका है।

इसलिए BRICS को केवल एक आर्थिक समूह के तौर पर देखना पूरी तस्वीर नहीं बताता। इसके पीछे वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की आवाज मजबूत करने और अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में अधिक संतुलन की लंबे समय से चली आ रही कोशिश भी जुड़ी हुई है।

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