तेल 100 डॉलर के करीब और दिल्ली आ रहे पुतिन, क्या मोदी निकाल पाएंगे राहत का रास्ता?


 रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 11 सितंबर को भारत पहुंच चुके हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम द्विपक्षीय बैठक होने वाली है। यह मुलाकात ऐसे समय हो रही है जब पश्चिम एशिया में तनाव और वैश्विक ऊर्जा बाजार में उथल-पुथल के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। ऐसे में मोदी-पुतिन मुलाकात में सिर्फ रणनीतिक और रक्षा संबंध ही नहीं, बल्कि तेल और ऊर्जा सहयोग भी बेहद अहम मुद्दा रहने वाला है।

तेल की कीमत बढ़ना भारत के लिए क्यों चिंता?

भारत अपनी जरूरत के 80 फीसदी से अधिक कच्चे तेल का आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ सकता है। इससे महंगाई, चालू खाते के घाटे और आर्थिक विकास पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ने से इसका असर आम लोगों की जेब तक भी पहुंच सकता है।

मौजूदा स्थिति में रूस भारत के लिए महत्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार बना हुआ है। यूक्रेन युद्ध के बाद रूस से मिलने वाले अपेक्षाकृत सस्ते तेल ने भारत की रिफाइनरियों के लिए अहम भूमिका निभाई है। लेकिन रूस से तेल खरीद को लेकर पश्चिमी देशों के दबाव और प्रतिबंधों के बीच भारत के लिए आगे की रणनीति आसान नहीं होगी।

मोदी-पुतिन बैठक में क्या रहेगा एजेंडा?

दोनों नेताओं की बैठक में व्यापार और आर्थिक सहयोग के साथ ऊर्जा, रक्षा और तकनीक जैसे मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। रूस के साथ परमाणु ऊर्जा सहयोग और रक्षा क्षेत्र भी लंबे समय से भारत-रूस संबंधों के महत्वपूर्ण हिस्से रहे हैं। इसके अलावा यूक्रेन संघर्ष और उसके वैश्विक आर्थिक प्रभाव पर भी बातचीत हो सकती है।

क्या रूस से मिल सकती है तेल पर राहत?

अगर भारत और रूस ऊर्जा सहयोग को और मजबूत करने पर किसी व्यावहारिक व्यवस्था तक पहुंचते हैं, तो इससे भारत को वैश्विक कीमतों के दबाव को संभालने में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, तेल की कीमत केवल भारत-रूस संबंधों से तय नहीं होती। पश्चिम एशिया में संघर्ष, समुद्री मार्गों की स्थिति, वैश्विक आपूर्ति और प्रतिबंध जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।

यूक्रेन पर भी रहेगी नजर

मोदी और पुतिन की बातचीत का एक अहम पहलू यूक्रेन युद्ध भी हो सकता है। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति के जरिए संघर्ष के समाधान की वकालत करता रहा है। ऐसे में नई दिल्ली अपने रूस संबंधों को बनाए रखते हुए शांति प्रयासों में अपनी भूमिका मजबूत करने की कोशिश कर सकती है।

कुल मिलाकर, पुतिन की यह यात्रा भारत-रूस संबंधों के लिए महत्वपूर्ण है। बढ़ते तेल दामों के बीच अगर दोनों देश ऊर्जा और व्यापार के क्षेत्र में कोई ठोस रास्ता निकाल पाते हैं, तो यह भारत के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों लिहाज से अहम उपलब्धि होगी।

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