भारत और म्यांमार के बीच सीमा से जुड़े एक पुराने विवाद को सुलझाने की कोशिशों ने नई चर्चा छेड़ दी है। हाल के दिनों में ऐसी खबरें सामने आई हैं कि दोनों देश मणिपुर से सटे सीमा क्षेत्र में सीमांकन (डिमार्केशन) पूरा करने के लिए जमीन की अदला-बदली (लैंड स्वैप) जैसे विकल्प पर विचार कर रहे हैं। हालांकि, भारत सरकार ने ऐसी किसी योजना की आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने केवल इतना कहा है कि दोनों देशों के बीच सीमा के कुछ हिस्से अब भी अनसुलझे हैं और उन्हें लेकर बातचीत जारी है।
रिपोर्टों के अनुसार, चर्चा मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार सीमा के एक छोटे से ऐसे हिस्से को लेकर है, जहां वर्षों से अंतिम सीमांकन नहीं हो पाया है। दावा किया गया है कि यदि दोनों देश सहमत होते हैं, तो सीमांकन को अंतिम रूप देने के लिए सीमित क्षेत्र में भू-समायोजन किया जा सकता है। हालांकि, इस संबंध में अभी कोई औपचारिक समझौता या सरकारी घोषणा नहीं हुई है।
यदि भविष्य में ऐसा प्रस्ताव आगे बढ़ता है, तो मणिपुर में इसका विरोध होने की संभावना जताई जा रही है। राज्य के कई सामाजिक और नागरिक संगठनों का कहना है कि किसी भी प्रकार की जमीन की अदला-बदली से राज्य की क्षेत्रीय अखंडता प्रभावित हो सकती है। उनका तर्क है कि स्थानीय लोगों की सहमति और व्यापक चर्चा के बिना ऐसा कोई कदम स्वीकार्य नहीं होगा। इसी कारण इस मुद्दे पर पहले से ही राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा विवाद सुलझने से दोनों देशों के बीच स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय सीमा तय करने, सीमा पर बाड़ लगाने, अवैध घुसपैठ, हथियारों और मादक पदार्थों की तस्करी पर नियंत्रण तथा सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने में मदद मिल सकती है। भारत लंबे समय से म्यांमार सीमा पर बेहतर निगरानी और सीमांकन की दिशा में काम कर रहा है।
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विदेश मंत्रालय ने केवल सीमा विवाद पर बातचीत की पुष्टि की है, जबकि जमीन की अदला-बदली की खबरों पर स्पष्ट सहमति या निर्णय की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में यह कहना जल्दबाजी होगी कि भारत और म्यांमार के बीच वास्तव में भूमि का आदान-प्रदान होगा। आने वाले समय में दोनों देशों के बीच होने वाली वार्ताओं और सरकार की आधिकारिक घोषणा के बाद ही इस मुद्दे की वास्तविक तस्वीर साफ हो सकेगी।
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