ब्रिक्स से पहले भारत का ‘जैवलिन दांव’, अमेरिका से मिसाइल डील के पीछे क्या है रणनीति?


 

भारत-अमेरिका के बीच अहम रक्षा सौदे की तैयारी

ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलनों से पहले भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। रिपोर्टों के मुताबिक, भारत अमेरिका से करीब 300 करोड़ रुपये की लागत से लगभग 100 जैवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइलें खरीदने की तैयारी कर रहा है।

जैवलिन मिसाइल को दुनिया की आधुनिक पोर्टेबल एंटी-टैंक मिसाइल प्रणालियों में शामिल किया जाता है। यह सौदा ऐसे समय में प्रस्तावित है, जब भारत अपनी सीमाओं पर सैन्य क्षमताओं को लगातार मजबूत कर रहा है।

क्या है जैवलिन मिसाइल?

जैवलिन एक कंधे से दागी जाने वाली एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली है। इसे खास तौर पर बख्तरबंद वाहनों और टैंकों को निशाना बनाने के लिए विकसित किया गया है। इसकी खासियत यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम समय में तैनात किया जा सकता है और इसे जमीन पर मौजूद सैनिक इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस तरह की मिसाइलें सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों की एंटी-आर्मर क्षमता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। भारत के लिए इन मिसाइलों की खरीद का उद्देश्य मौजूदा सैन्य क्षमताओं को और मजबूत करना माना जा रहा है।

चीन के संदर्भ में क्यों अहम है सौदा?

भारत लंबे समय से चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर सैन्य चुनौतियों का सामना कर रहा है। गलवान घाटी में 2020 की हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के बीच सीमा पर लंबे समय तक तनाव बना रहा।

ऐसे माहौल में भारत अपनी सैन्य तैयारियों को लगातार मजबूत कर रहा है। जैवलिन जैसी एंटी-टैंक मिसाइलें पहाड़ी और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में तैनात सैनिकों की क्षमता बढ़ाने में उपयोगी हो सकती हैं।

अमेरिका के साथ बढ़ता रक्षा सहयोग

जैवलिन सौदे को भारत और अमेरिका के बीच बढ़ते रक्षा सहयोग के संदर्भ में भी देखा जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक संबंध लगातार मजबूत हुए हैं।

अमेरिकी रक्षा तकनीक और आधुनिक हथियार प्रणालियों के साथ सहयोग भारत की सैन्य आधुनिकीकरण रणनीति का हिस्सा है। हालांकि, किसी भी रक्षा सौदे की अंतिम शर्तें और कीमत आधिकारिक मंजूरी तथा समझौते के बाद ही स्पष्ट होती हैं।

ब्रिक्स और SCO से पहले संदेश?

भारत का यह कदम ऐसे समय में सामने आया है जब ब्रिक्स और SCO जैसे बहुपक्षीय मंचों पर प्रमुख वैश्विक और क्षेत्रीय मुद्दों पर चर्चा होनी है। ऐसे में रक्षा क्षमता को मजबूत करने का फैसला भारत की रणनीतिक प्राथमिकताओं का संकेत माना जा सकता है।

हालांकि, जैवलिन मिसाइलों की खरीद को किसी एक देश के खिलाफ सीधे संदेश के रूप में देखना उचित नहीं होगा। भारत के लिए यह अपनी सैन्य जरूरतों, सीमाई सुरक्षा और रक्षा आधुनिकीकरण को मजबूत करने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।

अगर सौदा अंतिम रूप लेता है, तो इससे भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमता को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।

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