भारत में बनेगी जैवलिन मिसाइल: टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स का बड़ा करार, सेना की बढ़ेगी ताकत


 भारत और अमेरिका ने रक्षा क्षेत्र में सहयोग को और मजबूत करने की दिशा में एक अहम कदम उठाया है। अमेरिकी जैवलिन एंटी-टैंक मिसाइल सिस्टम को लेकर भारत में इसके उत्पादन की संभावनाएं अब और मजबूत हो गई हैं। टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड (TASL) और जैवलिन मिसाइल बनाने वाले संयुक्त उपक्रम के बीच हुए समझौते से भारत में इस अत्याधुनिक मिसाइल के ऑल-अप राउंड (AUR) के सह-उत्पादन का रास्ता खुल गया है।

क्या है जैवलिन मिसाइल?

जैवलिन एक अत्याधुनिक पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) है। इसे सैनिक आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जा सकते हैं और जरूरत पड़ने पर बख्तरबंद वाहनों तथा टैंकों को निशाना बना सकते हैं। इसकी खासियत यह है कि इसे अपेक्षाकृत कम दूरी से भी प्रभावी तरीके से इस्तेमाल किया जा सकता है।

जैवलिन की ‘फायर एंड फॉरगेट’ क्षमता इसे दूसरी कई एंटी-टैंक प्रणालियों से अलग बनाती है। मिसाइल दागे जाने के बाद ऑपरेटर को लगातार लक्ष्य पर निशाना बनाए रखने की जरूरत नहीं पड़ती। इससे सैनिक तेजी से अपनी स्थिति बदल सकते हैं और संभावित जवाबी कार्रवाई से बचने का मौका मिलता है।

भारत में उत्पादन क्यों है महत्वपूर्ण?

टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स और जैवलिन ज्वाइंट वेंचर के बीच समझौता भारत में मिसाइल के निर्माण से जुड़ी क्षमताओं को विकसित करने की दिशा में अहम माना जा रहा है। ऑल-अप राउंड से आशय मिसाइल के पूरी तरह तैयार और इस्तेमाल योग्य रूप से है।

भारत में उत्पादन होने से भविष्य में सेना की जरूरतों को पूरा करने में मदद मिल सकती है। साथ ही, इससे रक्षा उपकरणों के लिए विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता कम करने और देश में अत्याधुनिक रक्षा तकनीक का इकोसिस्टम विकसित करने में भी मदद मिलेगी।

भारतीय सेना की मारक क्षमता होगी मजबूत

भारतीय सेना लंबे समय से आधुनिक एंटी-टैंक हथियारों की क्षमता बढ़ाने पर जोर दे रही है। जैवलिन जैसी प्रणाली सेना को दुश्मन के आधुनिक बख्तरबंद वाहनों से निपटने के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध करा सकती है।

भारत और अमेरिका के बीच यह सहयोग केवल मिसाइल हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, विनिर्माण और रक्षा आत्मनिर्भरता के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। घरेलू स्तर पर उत्पादन बढ़ने से भारतीय रक्षा उद्योग को नई तकनीक और विशेषज्ञता हासिल करने का अवसर मिलेगा।

इस करार को भारत-अमेरिका के बढ़ते रक्षा सहयोग और ‘मेक इन इंडिया’ की दिशा में एक अहम कदम के तौर पर देखा जा सकता है। आने वाले समय में जैवलिन के सह-उत्पादन से भारतीय सेना की एंटी-टैंक क्षमता मजबूत होने के साथ-साथ देश की स्वदेशी रक्षा निर्माण क्षमता को भी बढ़ावा मिल सकता है।

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