ईरान को आर्थिक रूप से घेरने की तैयारी में अमेरिका, क्या भारत भी आएगा जद में?


 अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए ‘ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट’ शुरू किया है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट के मुताबिक, इस अभियान का उद्देश्य ईरान से जुड़े आर्थिक नेटवर्क और उसकी आय के प्रमुख स्रोतों को निशाना बनाना है। नई कार्रवाई में तेल, पेट्रोकेमिकल, बैंकिंग, शिपिंग, तकनीक, सोना, विमानन और डिजिटल एसेट जैसे क्षेत्रों से जुड़े करीब 60 व्यक्तियों, कंपनियों और जहाजों को निशाना बनाया गया है।

किन देशों पर बढ़ सकता है दबाव?

अमेरिका का निशाना केवल ईरान तक सीमित नहीं है। सेकेंडरी प्रतिबंधों के जरिए उन विदेशी कंपनियों और संस्थाओं पर भी कार्रवाई की जा सकती है, जो प्रतिबंधित ईरानी कारोबार में मदद करती हैं। इसका सबसे बड़ा असर ईरान के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर पड़ सकता है।

ईरान के लिए चीन सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक साझेदार है। चीन ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और 2025 में उसने करीब 13.8 लाख बैरल प्रतिदिन ईरानी तेल आयात किया। इसके अलावा तुर्की, इराक, संयुक्त अरब अमीरात और पाकिस्तान भी ईरान के महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदार हैं। भारत के साथ ईरान का व्यापार इन देशों की तुलना में काफी कम रह गया है।

अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन को लेकर है। चीन ईरान के तेल कारोबार की सबसे अहम कड़ी बना हुआ है और अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी है। इसलिए वॉशिंगटन को चीन पर कार्रवाई करने से पहले व्यापक आर्थिक और कूटनीतिक प्रभावों को भी ध्यान में रखना होगा।

क्या भारत भी आएगा जद में?

भारत के लिए यह मामला खास तौर पर महत्वपूर्ण है, क्योंकि 25 अगस्त 2026 को अमेरिका ने ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार से जुड़े चार भारत-आधारित कंपनियों और तीन भारतीय नागरिकों पर प्रतिबंध लगाए। इससे साफ है कि अमेरिकी कार्रवाई का असर भारतीय कारोबारियों तक भी पहुंच चुका है।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि भारत-ईरान का पूरा व्यापार तुरंत बंद हो जाएगा। भारत और ईरान के बीच मौजूदा व्यापार काफी हद तक मानवीय और गैर-तेल क्षेत्रों पर केंद्रित है। 2025-26 में दोनों देशों का व्यापार करीब 1.63 अरब डॉलर रहा। भारत की ओर से ईरान को चावल, दवाएं और अन्य जरूरी सामानों का निर्यात भी महत्वपूर्ण है।

चाबहार बंदरगाह पर क्या असर पड़ेगा?

भारत के लिए सबसे संवेदनशील मुद्दों में चाबहार बंदरगाह शामिल है। भारत इस बंदरगाह के जरिए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बनाने की रणनीति पर काम करता रहा है। अमेरिकी प्रतिबंधों का सख्त पालन होने की स्थिति में चाबहार से जुड़े भारतीय कारोबार और भुगतान व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पैदा हो सकता है। इससे भारत की क्षेत्रीय कनेक्टिविटी योजनाओं की लागत और संचालन दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

भारत के सामने क्या चुनौती है?

भारत को एक तरफ अमेरिका के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक संबंधों को ध्यान में रखना होगा, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ व्यापार, ऊर्जा और चाबहार जैसे रणनीतिक हितों को भी बनाए रखना होगा। यदि अमेरिका सेकेंडरी प्रतिबंधों को और व्यापक करता है, तो भारतीय कंपनियों के सामने अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था और ईरान के साथ कारोबार में से किसी एक को चुनने का दबाव बढ़ सकता है।

फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह है कि अमेरिका आगे चीन, भारत, तुर्की और अन्य देशों पर किस स्तर तक दबाव बढ़ाता है। हाल की कार्रवाई से संकेत जरूर मिल रहे हैं कि भारत भी पूरी तरह अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे से बाहर नहीं है, खासकर ईरान के तेल और पेट्रोकेमिकल कारोबार से जुड़े मामलों में।

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