पश्चिम एशिया में एक बार फिर बढ़ते तनाव और युद्धविराम टूटने की खबरों के बाद वैश्विक कच्चे तेल बाजार में उथल-पुथल देखने को मिल रही है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेज उछाल आया है, जिससे भारत जैसे बड़े तेल आयातक देशों की चिंता बढ़ गई है। हालिया तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड करीब 4 फीसदी बढ़कर 79 डॉलर प्रति बैरल के आसपास पहुंच गया है।
भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाले बदलाव का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था और ईंधन कीमतों पर पड़ सकता है। खासतौर पर यदि पश्चिम एशिया में तनाव लंबा खिंचता है और होर्मुज जलडमरूमध्य के जरिए तेल आपूर्ति प्रभावित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं।
हालांकि, फिलहाल पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तत्काल बढ़ोतरी की संभावना कम मानी जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि तेल विपणन कंपनियां पहले अंतरराष्ट्रीय कीमतों की दिशा और स्थिति की स्थिरता पर नजर रखेंगी। यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 80-90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं, तभी खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी पर विचार किया जा सकता है।
इसके अलावा, केंद्र सरकार के पास एक्साइज ड्यूटी में बदलाव या अन्य नीतिगत उपायों के जरिए आम लोगों पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के विकल्प भी मौजूद हैं। पहले भी सरकार तेल कीमतों में तेज उछाल के दौरान राहत उपाय कर चुकी है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि पश्चिम एशिया का संकट जल्द नहीं सुलझा, तो इसका असर सिर्फ पेट्रोल-डीजल ही नहीं, बल्कि महंगाई, परिवहन लागत और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है। वहीं, अगर हालात सामान्य होते हैं और तेल आपूर्ति बाधित नहीं होती, तो कीमतों में फिर से नरमी भी आ सकती है।
फिलहाल आम लोगों के लिए राहत की बात यह है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में तुरंत बढ़ोतरी का कोई आधिकारिक ऐलान नहीं हुआ है, लेकिन पश्चिम एशिया की स्थिति पर सरकार और तेल कंपनियां लगातार नजर बनाए हुए हैं
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