आर्यन ने बताया कि उन्होंने अपनी दादी को कैंसर से जूझते हुए बहुत करीब से देखा था। दादी की बीमारी और आखिरकार उन्हें खो देने का दर्द उनके मन पर गहरी छाप छोड़ गया। इसी दौरान उन्होंने मन ही मन यह संकल्प लिया कि वह बड़े होकर कैंसर के मरीजों की मदद करेंगे और इस बीमारी से लड़ने के लिए डॉक्टर बनेंगे।
आर्यन ने कहा कि दादी के संघर्ष को देखने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि कैंसर सिर्फ एक बीमारी नहीं, बल्कि पूरे परिवार के लिए कठिन परीक्षा होती है। यही वजह है कि उन्होंने ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में जाने का फैसला किया, ताकि भविष्य में वह मरीजों और उनके परिवारों को बेहतर इलाज और उम्मीद दे सकें।
दिलचस्प बात यह है कि आर्यन एक डॉक्टर परिवार से आते हैं। उनके पिता एनेस्थेटिस्ट और मां स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। परिवार के मेडिकल बैकग्राउंड ने भी उन्हें डॉक्टर बनने की प्रेरणा दी, लेकिन ऑन्कोलॉजिस्ट बनने का फैसला पूरी तरह उनकी व्यक्तिगत भावनाओं और दादी की यादों से जुड़ा है।
NEET परीक्षा रद्द होने और दोबारा आयोजित होने के बाद भी आर्यन ने हार नहीं मानी। उन्होंने कठिन परिस्थितियों में खुद को संभाला और दोबारा तैयारी कर शानदार प्रदर्शन किया। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि दर्द और मुश्किलें भी जीवन में बड़े सपनों की प्रेरणा बन सकती हैं।
आज आर्यन गुप्ता लाखों छात्रों के लिए सिर्फ एक टॉपर नहीं, बल्कि संघर्ष, समर्पण और संवेदनशीलता की मिसाल बन गए
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