Devshayani Ekadashi Vrat Katha: देवशयनी एकादशी की पूजा में पढ़ें राजा मंधाता की कथा, ऐसे मिली थी अकाल से मुक्ति


 Devshayani Ekadashi 2026: आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाने वाली देवशयनी एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित सबसे महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में योगनिद्रा में चले जाते हैं और चातुर्मास का शुभारंभ होता है। इस दिन विधि-विधान से व्रत, पूजा और कथा का श्रवण करने से सुख-समृद्धि, धन-धान्य और परिवार में खुशहाली बनी रहती है। मान्यता है कि देवशयनी एकादशी का प्रभाव इतना शुभ होता है कि इससे अकाल, संकट और दुखों से भी मुक्ति मिलती है।

देवशयनी एकादशी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में राजा मंधाता एक धर्मपरायण और न्यायप्रिय शासक थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी, लेकिन एक समय ऐसा आया जब लगातार तीन वर्षों तक वर्षा नहीं हुई। खेत सूख गए, अन्न का संकट गहरा गया और पूरे राज्य में अकाल फैल गया। भूख और प्यास से परेशान प्रजा ने राजा से इस संकट का समाधान करने की प्रार्थना की।

राजा मंधाता अपनी प्रजा का दुख देखकर अत्यंत चिंतित हुए। समाधान की खोज में वे जंगल गए, जहां उनकी भेंट महर्षि अंगिरा से हुई। राजा ने ऋषि को अपने राज्य में पड़े भीषण अकाल और जनता की पीड़ा के बारे में बताया तथा इससे मुक्ति का उपाय पूछा।

महर्षि अंगिरा ने राजा से कहा कि आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी का व्रत पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ करें। साथ ही राज्य की पूरी प्रजा भी भगवान विष्णु की आराधना करे और धर्म के मार्ग पर चले। ऋषि के निर्देशानुसार राजा मंधाता ने स्वयं व्रत रखा और पूरे राज्य में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करवाई।

कथा के अनुसार, भगवान विष्णु की कृपा से शीघ्र ही वर्षा हुई, खेत लहलहा उठे, अन्न की भरपूर उपज हुई और राज्य अकाल से मुक्त हो गया। इसके बाद राजा और उनकी प्रजा का जीवन फिर से सुख, समृद्धि और शांति से भर गया।

देवशयनी एकादशी का महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, दान और व्रत कथा का पाठ करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। घर में सुख-शांति, धन-धान्य और सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है। साथ ही जीवन के कष्ट दूर होते हैं और भगवान विष्णु की विशेष कृपा प्राप्त होती है। इसलिए देवशयनी एकादशी के दिन पूजा के साथ राजा मंधाता की इस पावन कथा का श्रवण और पाठ अवश्य किया जाता है।

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