कोविड-19 महामारी और लॉकडाउन का असर केवल बड़ों की जिंदगी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उस दौरान जन्मे बच्चों के विकास पर भी इसके प्रभाव को लेकर कई शोध सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि लॉकडाउन के समय पैदा हुए कुछ बच्चों में सामाजिक, भाषाई और व्यवहारिक विकास से जुड़ी चुनौतियां देखने को मिल सकती हैं। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर बच्चे में ऐसी समस्याएं होंगी, लेकिन माता-पिता को कुछ संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।
1. बोलने और भाषा विकास में देरी
लॉकडाउन के दौरान बच्चों का दायरा घर तक सीमित रहा। रिश्तेदारों, पड़ोसियों और अन्य बच्चों से कम संपर्क होने के कारण कुछ बच्चों में बोलने और भाषा सीखने की गति धीमी देखी गई है। यदि बच्चा अपनी उम्र के अनुसार शब्द बोलने या निर्देश समझने में परेशानी महसूस कर रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेना उचित हो सकता है।
2. सामाजिक व्यवहार में झिझक
कुछ बच्चों में लोगों से मिलने-जुलने में झिझक, भीड़ से डर या नए माहौल में असहज महसूस करने जैसी समस्याएं देखी गई हैं। लंबे समय तक सीमित सामाजिक संपर्क इसके पीछे एक कारण हो सकता है।
3. स्क्रीन पर बढ़ती निर्भरता
महामारी के दौरान कई परिवारों में बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ गया था। अत्यधिक मोबाइल, टीवी या टैबलेट का उपयोग ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, नींद और व्यवहार पर असर डाल सकता है।
4. भावनात्मक और व्यवहारिक बदलाव
कुछ बच्चों में चिड़चिड़ापन, जल्दी गुस्सा आना, अलगाव महसूस करना या दिनचर्या में बदलाव से अधिक प्रभावित होना जैसी समस्याएं भी देखी गई हैं।
माता-पिता क्या करें?
- बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं और उनसे बातचीत करें।
- उन्हें अन्य बच्चों के साथ खेलने और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेने के अवसर दें।
- स्क्रीन टाइम को सीमित करें और किताबें, कहानियां तथा रचनात्मक खेलों को बढ़ावा दें।
- नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद और संतुलित आहार सुनिश्चित करें।
- यदि बच्चे के विकास को लेकर लगातार चिंता बनी रहे, तो बाल रोग विशेषज्ञ या विकास विशेषज्ञ से परामर्श लें।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि हर बच्चा अलग होता है और विकास की गति भी अलग-अलग हो सकती है। इसलिए केवल तुलना के आधार पर निष्कर्ष निकालने से बचना चाहिए। सही माहौल, प्यार, संवाद और समय पर सहायता से अधिकांश बच्चे सामान्य रूप से आगे बढ़ सकते हैं।
माता-पिता के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे बच्चों के व्यवहार और विकास में होने वाले बदलावों पर ध्यान दें और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सलाह लेने में संकोच न करें। शुरुआती पहचान और सही मार्गदर्शन बच्चों के बेहतर विकास में अहम भूमिका निभा सकते हैं।
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