सोशल मीडिया की लत (Social Media Addiction) से जुड़े मामलों में टेक कंपनियों की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं। Meta और YouTube की मूल कंपनी Google ने जूरी के एक फैसले को अदालत में चुनौती दी है। कंपनियों का कहना है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर बच्चों और किशोरों में बढ़ती लत के लिए उन्हें सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।
यह मामला उन मुकदमों से जुड़ा है, जिनमें आरोप लगाया गया है कि सोशल मीडिया कंपनियों ने ऐसे एल्गोरिद्म और फीचर्स विकसित किए, जो उपयोगकर्ताओं, विशेष रूप से किशोरों, को लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखने के लिए डिजाइन किए गए। याचिकाकर्ताओं का दावा है कि इससे मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, चिंता, अवसाद और सोशल मीडिया की लत जैसी समस्याएं बढ़ी हैं।
हाल ही में जूरी ने कुछ मामलों में पीड़ित पक्ष के तर्कों को स्वीकार करते हुए कंपनियों के खिलाफ आगे कानूनी कार्रवाई का रास्ता खोला था। इसके बाद Meta और YouTube ने अदालत में अपील दायर कर इस फैसले को चुनौती दी है। कंपनियों का तर्क है कि उनके प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री तीसरे पक्ष द्वारा बनाई जाती है और अमेरिकी कानून की धारा 230 (Section 230) के तहत उन्हें उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए व्यापक कानूनी सुरक्षा प्राप्त है।
कंपनियों ने यह भी कहा है कि वे किशोरों की सुरक्षा के लिए कई कदम उठा चुकी हैं। इनमें स्क्रीन टाइम नियंत्रण, पैरेंटल कंट्रोल, आयु-उपयुक्त अनुभव और संवेदनशील सामग्री पर प्रतिबंध जैसे फीचर्स शामिल हैं। Meta का कहना है कि उसने हाल के वर्षों में किशोर उपयोगकर्ताओं के लिए कई नई सुरक्षा नीतियां लागू की हैं, जबकि YouTube ने भी बच्चों और युवाओं की सुरक्षा के लिए अपने नियमों को सख्त किया है।
दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि सोशल मीडिया कंपनियों के बिजनेस मॉडल का बड़ा हिस्सा उपयोगकर्ताओं की अधिकतम सहभागिता (Engagement) पर आधारित है, जिसके कारण एल्गोरिद्म ऐसे कंटेंट को बढ़ावा देते हैं जो लोगों को अधिक समय तक प्लेटफॉर्म पर बनाए रखे।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल Meta और YouTube तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरी टेक इंडस्ट्री के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल बन सकता है। यदि अदालत जूरी के फैसले को बरकरार रखती है, तो भविष्य में सोशल मीडिया कंपनियों की जवाबदेही और नियामकीय दबाव काफी बढ़ सकता है।
फिलहाल, सभी की नजर अदालत के अगले फैसले पर टिकी है, क्योंकि इसका असर दुनिया भर में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के संचालन और उनके कानूनी दायित्वों पर पड़ सकता है।
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