मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव एक बार फिर गंभीर होता दिखाई दे रहा है। हालिया घटनाक्रम में अमेरिका ने ईरान से जुड़े ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं, जिसकी पुष्टि अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने भी की है। इन हमलों के बाद क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां तेज हो गई हैं और दोनों देशों के बीच टकराव और गहरा होने की आशंका जताई जा रही है। कुछ रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि अमेरिका संभावित लंबे सैन्य संघर्ष की तैयारी कर रहा है, हालांकि इस संबंध में आधिकारिक तौर पर कोई स्पष्ट घोषणा नहीं की गई है।
अमेरिकी कार्रवाई के जवाब में ईरान ने कुवैत और बहरीन में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया। इससे पूरे पश्चिम एशिया में सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। दोनों पक्षों की ओर से लगातार जवाबी कार्रवाई और कड़े बयानों ने हालात को और संवेदनशील बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तनाव इसी तरह बढ़ता रहा तो इसका असर केवल क्षेत्रीय सुरक्षा तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
इस बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने ईरान को कड़ी चेतावनी दी है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिकी जहाजों पर हमले जारी रहे या होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद करने की कोई कोशिश की गई, तो अमेरिकी सेना पहले से भी अधिक कठोर जवाबी कार्रवाई करेगी। अमेरिका का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बाधित करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में गिना जाता है। वैश्विक कच्चे तेल का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह का सैन्य तनाव अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकता है। यदि संघर्ष लंबा खिंचता है, तो तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला पर दबाव बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है।
अंतरराष्ट्रीय समुदाय लगातार दोनों देशों से संयम बरतने और बातचीत के जरिए विवाद का समाधान निकालने की अपील कर रहा है। कई देशों का मानना है कि सैन्य टकराव की बजाय कूटनीतिक प्रयासों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए, ताकि क्षेत्र में शांति और स्थिरता बनी रहे।
फिलहाल अमेरिका और ईरान के बीच हालात बेहद तनावपूर्ण बने हुए हैं। आने वाले दिनों में दोनों देशों की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय समुदाय की पहल यह तय करेगी कि यह संकट बातचीत से सुलझेगा या फिर एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का रूप लेगा।
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