अमेरिका और ईरान के बीच एक बार फिर तनाव तेजी से बढ़ता नजर आ रहा है। 17 जून को दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम को लेकर बनी सहमति के बाद उम्मीद जताई जा रही थी कि क्षेत्र में हालात सामान्य होंगे, लेकिन एक महीने के भीतर ही तनाव फिर गहरा गया। इस बार विवाद की सबसे बड़ी वजह फारस की खाड़ी में स्थित रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य और ईरान का खर्ग द्वीप बनकर उभरा है, जिसे ईरान के तेल निर्यात की सबसे बड़ी लाइफलाइन माना जाता है।
तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने खर्ग द्वीप को लेकर अपनी रुचि जाहिर की। इस बयान के बाद ईरान ने कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए चेतावनी दी कि उसकी संप्रभुता या ऊर्जा ढांचे को नुकसान पहुंचाने की किसी भी कोशिश का जवाब सख्ती से दिया जाएगा। इसके बाद दोनों देशों के बीच बयानबाजी तेज हो गई और क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां भी बढ़ने लगीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका और ईरान के बीच विवाद केवल तेल या समुद्री मार्ग तक सीमित नहीं है। परमाणु कार्यक्रम, पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने की होड़, प्रतिबंधों की राजनीति और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे कई मुद्दे वर्षों से दोनों देशों के रिश्तों में तनाव की वजह बने हुए हैं। ऐसे में संघर्ष विराम के बावजूद हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हो पाए और अब एक बार फिर टकराव की आशंका बढ़ गई है।
इस बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्गों में से एक है और यहां किसी भी तरह की बाधा से कच्चे तेल की आपूर्ति प्रभावित हो सकती है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों में तेजी आने की संभावना रहती है, जिसका असर भारत सहित कई आयातक देशों पर पड़ सकता है।
भारत इस पूरे घटनाक्रम पर लगातार नजर बनाए हुए है। सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और क्षेत्र में मौजूद भारतीय नागरिकों की सुरक्षा को लेकर संबंधित मंत्रालयों और एजेंसियों के साथ समन्वय बढ़ाया है। साथ ही वैकल्पिक ऊर्जा आपूर्ति और आपातकालीन योजनाओं की भी समीक्षा की जा रही है, ताकि यदि पश्चिम एशिया में हालात और बिगड़ते हैं तो देश पर उसका असर कम से कम पड़े।
कुल मिलाकर, अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव केवल दो देशों का मामला नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ सकता है। ऐसे में दुनिया की नजरें अब इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में दोनों देश बातचीत का रास्ता अपनाते हैं या फिर यह विवाद एक बड़े संकट का रूप लेता है।
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