विश्व मौसम विज्ञान संगठन (WMO) ने चेतावनी दी है कि जुलाई से सितंबर के दौरान अल नीनो (El Niño) के तेजी से मजबूत होने की संभावना है। यदि ऐसा होता है तो इसका असर केवल एक या दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगड़ सकता है। संगठन के अनुसार, इस दौरान हीटवेव, सूखा, अत्यधिक बारिश, बाढ़ और समुद्री हीटवेव जैसी चरम मौसमी घटनाओं में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

अल नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का समुद्री सतह तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। यह बदलाव दुनिया भर के मौसम पैटर्न को प्रभावित करता है। कई देशों में सामान्य से कम बारिश होती है, जबकि कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा और बाढ़ जैसी स्थितियां पैदा हो जाती हैं।

भारत के लिए भी यह चेतावनी अहम मानी जा रही है। आमतौर पर अल नीनो का असर भारतीय मानसून पर पड़ता है और इसके कारण कई राज्यों में सामान्य से कम बारिश दर्ज की जा सकती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अल नीनो के आधार पर पूरे मानसून का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। हिंद महासागर की स्थिति, मानसूनी हवाएं और अन्य जलवायु कारक भी बारिश को प्रभावित करते हैं। इसलिए अलग-अलग राज्यों में वर्षा का प्रभाव अलग हो सकता है।

कम बारिश की स्थिति बनने पर कृषि क्षेत्र सबसे अधिक प्रभावित होता है। धान, मक्का, दालें और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई पर असर पड़ सकता है। इसके अलावा जलाशयों में पानी का स्तर घटने, पेयजल संकट बढ़ने और बिजली उत्पादन पर भी दबाव बढ़ने की आशंका रहती है। दूसरी ओर, जिन क्षेत्रों में अत्यधिक बारिश होती है, वहां बाढ़, भूस्खलन और फसलों को नुकसान जैसी समस्याएं सामने आ सकती हैं।

WMO ने यह भी कहा है कि बढ़ते वैश्विक तापमान और जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो का प्रभाव पहले की तुलना में अधिक गंभीर महसूस हो सकता है। समुद्र का बढ़ता तापमान समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र, मत्स्य उद्योग और तटीय इलाकों पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में मौसम विभागों द्वारा जारी किए जाने वाले अपडेट पर लगातार नजर रखना जरूरी होगा। किसानों, प्रशासन और आम लोगों को मौसम संबंधी चेतावनियों का पालन करना चाहिए, ताकि संभावित जोखिमों को कम किया जा सके। यदि अल नीनो मजबूत होता है, तो यह दुनिया के कई हिस्सों के साथ भारत के मौसम, कृषि और अर्थव्यवस्था पर भी महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकता है।

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