ऑनलाइन शॉपिंग और वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म Amazon एक बार फिर कानूनी विवाद में फंस गया है। कंपनी पर आरोप है कि उसने Prime Video का पेड सब्सक्रिप्शन लेने वाले ग्राहकों को भी विज्ञापन दिखाए। इस मामले को लेकर कंपनी के खिलाफ कोर्ट में मुकदमा दायर किया गया है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि बिना स्पष्ट सहमति के सेवा की शर्तों में बदलाव कर ग्राहकों को विज्ञापन दिखाना उपभोक्ता अधिकारों का उल्लंघन है।
क्या है पूरा मामला?
मामले के अनुसार, Amazon ने Prime Video की स्ट्रीमिंग सेवा में विज्ञापन शामिल कर दिए, जबकि पहले प्राइम सदस्य बिना विज्ञापनों के कंटेंट देख पाते थे। बाद में कंपनी ने विज्ञापन-मुक्त अनुभव के लिए अलग से अतिरिक्त शुल्क देने का विकल्प पेश किया। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि जिन ग्राहकों ने पहले से विज्ञापन-रहित सेवा के लिए सदस्यता ली थी, उन्हें बिना उचित अनुमति और पर्याप्त सूचना के नई व्यवस्था में शामिल कर दिया गया।
कोर्ट में क्यों पहुंचा मामला?
शिकायत में कहा गया है कि Amazon ने ग्राहकों से पहले जिस सेवा का वादा किया था, बाद में उसकी शर्तें बदल दीं। उपभोक्ताओं का दावा है कि कंपनी ने विज्ञापन हटाने के लिए अतिरिक्त भुगतान की शर्त जोड़कर अनुबंध का उल्लंघन किया है। इसी आधार पर मामला अदालत तक पहुंचा, जहां कंपनी के फैसले को चुनौती दी गई है।
Amazon का क्या है पक्ष?
Amazon का कहना है कि Prime Video सेवा की शर्तों में बदलाव की जानकारी ग्राहकों को पहले ही दे दी गई थी। कंपनी का दावा है कि विज्ञापनों से मिलने वाली अतिरिक्त आय का उपयोग बेहतर कंटेंट तैयार करने और प्लेटफॉर्म में निवेश बढ़ाने के लिए किया जाएगा। साथ ही, जो ग्राहक बिना विज्ञापन के कंटेंट देखना चाहते हैं, उनके लिए अलग ऐड-फ्री प्लान उपलब्ध कराया गया है।
ग्राहकों पर क्या पड़ेगा असर?
यदि अदालत इस मामले में उपभोक्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाती है, तो Amazon को अपनी सदस्यता नीति में बदलाव करना पड़ सकता है। वहीं यदि कंपनी का पक्ष मजबूत माना जाता है, तो भविष्य में अन्य स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म भी इसी तरह के मॉडल अपनाने के लिए प्रोत्साहित हो सकते हैं। फिलहाल यह मामला उपभोक्ता अधिकारों और डिजिटल सब्सक्रिप्शन सेवाओं की पारदर्शिता को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
क्यों अहम है यह विवाद?
दुनियाभर में स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म तेजी से अपने बिजनेस मॉडल में बदलाव कर रहे हैं। ऐसे में यह मामला तय कर सकता है कि किसी पेड सब्सक्रिप्शन सेवा की शर्तों में बदलाव करते समय कंपनियों की जिम्मेदारी क्या होगी और ग्राहकों के अधिकार किस हद तक सुरक्षित रहेंगे। कोर्ट के फैसले पर अब तकनीकी उद्योग और करोड़ों सब्सक्राइबर्स की नजर बनी हुई है।
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