हिमाचल प्रदेश के आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य विभाग ने हेपेटाइटिस-बी (Hepatitis B) संक्रमण को लेकर सतर्कता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों के अनुसार, यह एक गंभीर संक्रामक बीमारी है जो संक्रमित रक्त, असुरक्षित इंजेक्शन, संक्रमित व्यक्ति के शारीरिक द्रवों तथा मां से बच्चे में फैल सकती है। समय पर पहचान और उपचार न होने पर यह बीमारी लंबे समय तक लीवर को नुकसान पहुंचा सकती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि क्रोनिक हेपेटाइटिस-बी संक्रमण से लीवर सिरोसिस और लीवर कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। वहीं, जिन लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता पहले से कमजोर होती है, जैसे HIV संक्रमित मरीज, उनके लिए यह संक्रमण और अधिक गंभीर साबित हो सकता है। इसलिए जोखिम वाले क्षेत्रों में नियमित जांच और जागरूकता अभियान चलाने पर जोर दिया जा रहा है।
हेपेटाइटिस-बी के शुरुआती लक्षणों में थकान, भूख कम लगना, मतली, पेट दर्द, बुखार और त्वचा या आंखों का पीला पड़ना शामिल हो सकते हैं। हालांकि, कई मामलों में लंबे समय तक कोई लक्षण दिखाई नहीं देते, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, हेपेटाइटिस-बी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका टीकाकरण है। इसके अलावा, सुरक्षित रक्त चढ़ाना, एक बार इस्तेमाल होने वाली सुइयों का उपयोग, व्यक्तिगत स्वच्छता का ध्यान रखना और असुरक्षित संपर्क से बचना भी संक्रमण के जोखिम को कम करता है।
स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि यदि वे जोखिम वाले क्षेत्रों में रहते हैं या संक्रमण से जुड़े किसी भी लक्षण का अनुभव करते हैं, तो तुरंत जांच कराएं। समय रहते पहचान और उपचार से गंभीर जटिलताओं, विशेषकर लीवर कैंसर जैसी स्थितियों के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है
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