H-1B वीजा धारकों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, ग्रीन कार्ड का रास्ता कठिन बनाने वाला प्रस्ताव अमेरिकी संसद में पेश


 अमेरिका में काम करने और स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) की उम्मीद रखने वाले हजारों विदेशी पेशेवरों, खासकर भारतीयों के लिए चिंता बढ़ाने वाली खबर सामने आई है। अमेरिकी कांग्रेस में एक नया विधेयक पेश किया गया है, जिसमें एच-1बी वीजा प्रणाली में बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है। यदि यह प्रस्ताव कानून का रूप लेता है, तो एच-1बी वीजा धारकों के लिए अमेरिका में लंबे समय तक रहना और ग्रीन कार्ड प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक कठिन हो सकता है।

प्रस्ताव को रिपब्लिकन सांसद Chip Roy ने पेश किया है। इसमें एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि को वर्तमान छह वर्ष से घटाकर केवल दो वर्ष करने की मांग की गई है। इसके अलावा, विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने की अनुमति देने वाले ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम को भी समाप्त करने का सुझाव दिया गया है।

विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि एच-1बी वीजा को ग्रीन कार्ड प्राप्त करने के आसान मार्ग के रूप में इस्तेमाल होने से रोकने की बात कही गई है। प्रस्ताव के समर्थकों का तर्क है कि इससे अमेरिकी नागरिकों के लिए रोजगार के अधिक अवसर उपलब्ध होंगे और विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता कम होगी।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के बदलावों का सबसे ज्यादा असर भारतीय आईटी पेशेवरों पर पड़ सकता है, जो एच-1बी वीजा के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हैं। बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर और तकनीकी विशेषज्ञ अमेरिका में इसी वीजा के माध्यम से काम कर रहे हैं और भविष्य में ग्रीन कार्ड पाने की उम्मीद रखते हैं।

इसके अलावा, अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों, विशेषकर भारतीय छात्रों के लिए भी यह प्रस्ताव चिंता का विषय बन सकता है। OPT कार्यक्रम समाप्त होने की स्थिति में छात्रों के लिए पढ़ाई के बाद अमेरिका में नौकरी हासिल करना और कार्य अनुभव प्राप्त करना कठिन हो सकता है।

गौरतलब है कि Donald Trump के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन पहले से ही कानूनी आव्रजन नियमों को सख्त करने की दिशा में कदम उठा रहा है। ऐसे में इस नए प्रस्ताव ने विदेशी पेशेवरों और छात्रों के बीच भविष्य को लेकर नई चिंताएं पैदा कर दी हैं।

फिलहाल यह केवल एक विधेयक है और इसे कानून बनने के लिए कांग्रेस के दोनों सदनों से मंजूरी मिलने के साथ राष्ट्रपति की स्वीकृति भी आवश्यक होगी। इसलिए इसके अंतिम स्वरूप और प्रभाव को लेकर अभी स्थिति पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

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