भारत दुनिया के सबसे बड़े चीनी उत्पादकों में से एक है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में देश से चीनी निर्यात में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिली है। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं, जिनमें अल नीनो का प्रभाव, एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने की सरकारी नीति और गन्ने के उत्पादन में कमी प्रमुख हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन सभी कारकों का संयुक्त प्रभाव चीनी निर्यात को प्रभावित कर रहा है।
अल नीनो का असर
अल नीनो एक जलवायु संबंधी घटना है, जो मानसून को प्रभावित करती है। भारत में कमजोर या असमान बारिश का सीधा असर गन्ने की खेती पर पड़ता है। महाराष्ट्र, कर्नाटक और उत्तर प्रदेश जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में वर्षा की कमी से उत्पादन प्रभावित हुआ है। जब गन्ने की पैदावार कम होती है तो चीनी उत्पादन भी घट जाता है, जिससे निर्यात के लिए उपलब्ध मात्रा कम हो जाती है।
एथेनॉल कार्यक्रम बना बड़ा कारण
केंद्र सरकार पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने के लक्ष्य पर तेजी से काम कर रही है। इसके लिए चीनी मिलों को गन्ने और शीरे (मोलासेस) से एथेनॉल उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। परिणामस्वरूप, गन्ने का एक बड़ा हिस्सा अब चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इससे घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता और निर्यात योग्य अधिशेष दोनों प्रभावित हुए हैं।
उत्पादन में गिरावट
कई क्षेत्रों में मौसम संबंधी चुनौतियों, फसल रोगों और जल संकट के कारण गन्ने की उत्पादकता में कमी आई है। इससे कुल चीनी उत्पादन पर दबाव बढ़ा है। सरकार की प्राथमिकता पहले घरेलू मांग को पूरा करने की रहती है, इसलिए उत्पादन घटने की स्थिति में निर्यात पर स्वाभाविक रूप से असर पड़ता है।
सरकार की निर्यात नीति
घरेलू बाजार में चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने और पर्याप्त स्टॉक सुनिश्चित करने के लिए सरकार समय-समय पर निर्यात पर प्रतिबंध या सीमाएं लगाती रही है। जब उत्पादन को लेकर अनिश्चितता बढ़ती है, तब सरकार निर्यात को सीमित कर घरेलू आपूर्ति को प्राथमिकता देती है।
असली वजह क्या है?
विशेषज्ञों के अनुसार, केवल एक कारण को जिम्मेदार ठहराना सही नहीं होगा। अल नीनो के कारण प्रभावित उत्पादन, एथेनॉल कार्यक्रम के लिए बढ़ता गन्ना उपयोग और घरेलू मांग को सुरक्षित रखने की सरकारी नीति—इन तीनों ने मिलकर भारतीय चीनी निर्यात को प्रभावित किया है। हालांकि सबसे बड़ा संरचनात्मक बदलाव एथेनॉल उत्पादन को बढ़ावा देने वाली नीति को माना जा रहा है, जिसने चीनी उद्योग की प्राथमिकताओं को बदल दिया है।
आने वाले वर्षों में भी भारत की चीनी निर्यात नीति काफी हद तक गन्ना उत्पादन, मौसम की स्थिति और एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की प्रगति पर निर्भर करेगी। ऐसे में वैश्विक चीनी बाजार भारत की उत्पादन क्षमता और सरकारी नीतियों पर लगातार नजर बनाए हुए है।
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