Emergency@51: जब देश पर लगा आपातकाल, जानें कैसे बनी थी इंदिरा सरकार की योजना और क्या थे उस दौर के हालात


 भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे विवादित अध्याय 25 जून 1975 को शुरू हुआ, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने देश में आपातकाल लागू करने का फैसला किया। आजादी के केवल 28 साल बाद लिया गया यह निर्णय भारतीय राजनीति और लोकतंत्र के लिए एक बड़ा मोड़ साबित हुआ। आपातकाल 21 महीने तक चला और 21 मार्च 1977 को समाप्त हुआ।

आपातकाल की पृष्ठभूमि कई राजनीतिक और सामाजिक घटनाओं से जुड़ी हुई थी। 1970 के दशक की शुरुआत में देश महंगाई, बेरोजगारी और आर्थिक चुनौतियों से जूझ रहा था। इसी दौरान गुजरात और बिहार में छात्र आंदोलनों ने सरकार के खिलाफ माहौल बनाना शुरू कर दिया। समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण ने इन आंदोलनों का नेतृत्व संभाला और "संपूर्ण क्रांति" का नारा दिया। धीरे-धीरे यह आंदोलन केंद्र सरकार के खिलाफ एक बड़े जनआंदोलन में बदल गया।

स्थिति तब और गंभीर हो गई जब 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली लोकसभा चुनाव में चुनावी अनियमितताओं के आरोपों को लेकर इंदिरा गांधी के चुनाव को अमान्य घोषित कर दिया। अदालत ने उनके सांसद बने रहने और चुनाव लड़ने पर भी रोक लगा दी। इस फैसले ने राजनीतिक संकट को और गहरा कर दिया। विपक्ष ने इंदिरा गांधी से इस्तीफे की मांग तेज कर दी।

इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व और सरकार के शीर्ष स्तर पर लगातार बैठकों का दौर चला। माना जाता है कि तत्कालीन पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर राय ने संवैधानिक प्रावधानों के तहत आपातकाल लगाने का सुझाव दिया था। 25 जून 1975 की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आंतरिक अशांति का हवाला देते हुए आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर कर दिए।

आपातकाल लागू होते ही देशभर में विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां शुरू हो गईं। प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, राजनीतिक गतिविधियों पर नियंत्रण बढ़ा दिया गया और नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर दिया गया। जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी समेत कई बड़े विपक्षी नेताओं को जेल भेज दिया गया।

सरकार ने इस दौरान 20 सूत्रीय कार्यक्रम लागू कर विकास और प्रशासनिक सुधारों पर जोर दिया, लेकिन लोकतांत्रिक अधिकारों पर लगाए गए प्रतिबंधों को लेकर व्यापक आलोचना भी हुई। आखिरकार जनवरी 1977 में चुनाव कराने का फैसला लिया गया और मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त हो गया। चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का सामना करना पड़ा और पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी।

आपातकाल का दौर आज भी भारतीय लोकतंत्र के लिए एक महत्वपूर्ण सबक माना जाता है, जो संविधान, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती के महत्व को रेखांकित करता है।

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