भारतीय निशानेबाजी जगत के लिए शुक्रवार का दिन बेहद दुखद साबित हुआ। प्रसिद्ध निशानेबाजी कोच और पूर्व अंतरराष्ट्रीय शूटर जसपाल राणा का 49 वर्ष की आयु में निधन हो गया। बताया जा रहा है कि आईएसएसएफ म्यूनिख विश्व कप से लौटने के दौरान उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई, जिसके बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि डॉक्टरों के प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन से भारतीय खेल जगत में शोक की लहर दौड़ गई है।
जसपाल राणा केवल एक सफल कोच ही नहीं थे, बल्कि भारत के सबसे शानदार निशानेबाजों में भी शामिल रहे। कम उम्र में ही उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का नाम रोशन किया। उन्होंने एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया।
निशानेबाजी में जसपाल राणा का उदय 1990 के दशक में हुआ, जब उन्होंने लगातार शानदार प्रदर्शन करते हुए भारत को कई बड़े पदक दिलाए। उनकी सटीक निशानेबाजी और दबाव में बेहतरीन प्रदर्शन करने की क्षमता ने उन्हें देश के सबसे सफल शूटरों में शामिल कर दिया। अपने करियर के दौरान उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड भी बनाए।
खिलाड़ी के रूप में शानदार सफलता हासिल करने के बाद जसपाल राणा ने कोचिंग की जिम्मेदारी संभाली। यहां भी उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई। उनके मार्गदर्शन में कई युवा निशानेबाजों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल की। खासतौर पर स्टार शूटर Manu Bhaker के करियर को संवारने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। मनु भाकर समेत कई खिलाड़ियों ने उनके प्रशिक्षण में विश्व स्तरीय प्रदर्शन किया और भारत के लिए पदक जीते।
जसपाल राणा को भारतीय निशानेबाजी में नई प्रतिभाओं को निखारने और खेल को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी दिया जाता है। उन्होंने वर्षों तक युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षित कर देश के लिए मजबूत निशानेबाजी ढांचा तैयार करने में योगदान दिया। उनके अनुभव और समर्पण ने भारतीय शूटिंग को विश्व स्तर पर नई पहचान दिलाई।
उनके निधन पर राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, खेल संगठनों और देशभर के खिलाड़ियों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। सभी ने उन्हें भारतीय खेलों का एक महान योद्धा और प्रेरणास्रोत बताया है।
जसपाल राणा भले ही आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन एक खिलाड़ी, गुरु और मार्गदर्शक के रूप में उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी। भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज रहेगा।
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