हर साल 3 जून को मनाया जाने वाला World Bicycle Day साइकिल के महत्व, स्वास्थ्य लाभ और पर्यावरण संरक्षण में उसकी भूमिका को रेखांकित करता है। इस अवसर पर इंदौर की साइकिल संस्कृति की कहानी भी खास चर्चा में है, जिसने दशकों के दौरान कई बदलाव देखे हैं।
इंदौर में 1930 के दशक से साइकिल आम लोगों के लिए सबसे लोकप्रिय परिवहन साधनों में से एक रही है। उस दौर में साइकिल केवल आने-जाने का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और सुविधा का प्रतीक मानी जाती थी। दिलचस्प बात यह है कि उस समय साइकिल खरीदने के बाद उसे चलाने के लिए लाइसेंस बनवाना पड़ता था और उस पर कर (टैक्स) भी देना होता था।
इतिहासकारों के अनुसार, उस दौर में करीब 10 रुपये की कीमत में साइकिल खरीदी जा सकती थी, लेकिन इसके उपयोग के लिए स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित नियमों का पालन करना अनिवार्य था। साइकिल मालिकों को पंजीकरण कराना पड़ता था और पहचान के लिए विशेष नंबर प्लेट भी लगाई जाती थी।
समय के साथ इंदौर की सड़कों पर मोटरसाइकिलों और कारों का दबदबा बढ़ा, जिससे साइकिल का उपयोग कम होने लगा। हालांकि पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता और पर्यावरण संरक्षण की चिंता ने साइकिल को फिर से लोकप्रिय बना दिया है।
आज साइकिल सिर्फ एक साधारण वाहन नहीं, बल्कि फिटनेस, खेल और हरित जीवनशैली का प्रतीक बन चुकी है। शहर में कई लोग सुबह की सैर, लंबी राइड और साइक्लिंग क्लबों के जरिए इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना रहे हैं। आधुनिक तकनीक से लैस हाई-एंड साइकिलों की कीमत अब हजारों नहीं बल्कि लाखों रुपये तक पहुंच चुकी है।
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