सफल हो गया? छोटे देशों ने दिग्गजों को रोककर बदल दी विश्व कप की कहानी


 फीफा विश्व कप 2026 के विस्तार को लेकर शुरुआत में कई सवाल उठे थे। आलोचकों का कहना था कि 48 टीमों वाला टूर्नामेंट गुणवत्ता को प्रभावित करेगा और बड़े देशों का दबदबा और बढ़ जाएगा। लेकिन शुरुआती मुकाबलों ने इस धारणा को चुनौती दे दी है। छोटे और अपेक्षाकृत कमजोर माने जाने वाले देशों ने फुटबॉल के दिग्गजों को कड़ी टक्कर देकर विश्व कप की तस्वीर बदल दी है।

मोरक्को ने ब्राजील को ड्रॉ पर रोका, जापान ने नीदरलैंड्स के खिलाफ अंक बटोरा, केप वर्डे ने स्पेन और उरुग्वे दोनों को बराबरी पर रोक दिया। वहीं डीआर कांगो ने पुर्तगाल को जीत से वंचित रखा। ईरान ने बेल्जियम के खिलाफ ड्रॉ खेला, जबकि मिस्र ने भी बेल्जियम को अंक गंवाने पर मजबूर किया। इन नतीजों ने दिखा दिया कि अब विश्व फुटबॉल में अंतर पहले जितना बड़ा नहीं रह गया है।

विश्व कप के नए प्रारूप का उद्देश्य अधिक देशों को वैश्विक मंच देना था। अब तक के नतीजे संकेत दे रहे हैं कि यह प्रयोग सफल होता दिख रहा है। जिन टीमों को पहले केवल भागीदारी तक सीमित माना जाता था, वे अब बड़े देशों के लिए चुनौती बन रही हैं। इससे मुकाबले अधिक रोमांचक और अप्रत्याशित हो गए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया, अफ्रीका और कॉनकाकाफ क्षेत्र की टीमों में पिछले कुछ वर्षों में काफी सुधार हुआ है। बेहतर कोचिंग, विदेशी लीगों में खिलाड़ियों की बढ़ती मौजूदगी और आधुनिक फुटबॉल ढांचे ने इन देशों को मजबूत बनाया है। इसका असर विश्व कप के मैदान पर साफ दिखाई दे रहा है।

हालांकि टूर्नामेंट अभी शुरुआती दौर में है और बड़े देशों के पास वापसी का पूरा मौका है, लेकिन एक बात स्पष्ट हो चुकी है—48 टीमों वाले विश्व कप का मकसद केवल संख्या बढ़ाना नहीं था। छोटे देशों को अवसर देने का फैसला अब प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और फुटबॉल को अधिक वैश्विक बनाने की दिशा में सफल कदम नजर आ रहा है। यही कारण है कि विश्व कप 2026 की सबसे बड़ी कहानी फिलहाल बड़े देशों की जीत नहीं, बल्कि छोटे देशों की चुनौती बन चुकी है।

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