पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका और ईरान के बीच संभावित समझौते को लेकर बातचीत तेज हो गई है। हालांकि बातचीत अंतिम चरण में बताई जा रही है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने ईरान के सामने कुछ ऐसी सख्त शर्तें रखी हैं, जिन पर सहमति बनाना आसान नहीं माना जा रहा। अमेरिकी ट्रेजरी सेक्रेटरी Scott Bessent ने साफ कहा है कि अमेरिका “खराब डील” नहीं करेगा और ईरान को कई बड़े समझौते करने होंगे।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के सामने तीन प्रमुख “रेड लाइन” रखी हैं। पहली शर्त यह है कि ईरान अपने अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम (Highly Enriched Uranium) को पूरी तरह सौंपे। दूसरी शर्त के तहत ईरान को परमाणु हथियार बनाने की किसी भी कोशिश को स्थायी रूप से छोड़ना होगा। वहीं तीसरी और सबसे अहम शर्त होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों की निर्बाध आवाजाही बहाल करना है।
अमेरिका का कहना है कि जब तक ईरान इन शर्तों को नहीं मानता, तब तक उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में कोई राहत नहीं दी जाएगी। स्कॉट बेसेंट ने स्पष्ट किया कि “होर्मुज खुला होना चाहिए, यूरेनियम सौंपना होगा और ईरान परमाणु कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ा सकता।”
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के सबसे अहम तेल मार्गों में से एक है। वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। हाल के महीनों में इस क्षेत्र में तनाव बढ़ने से तेल की कीमतों में उछाल देखा गया था। ऐसे में अमेरिका चाहता है कि ईरान इस मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित और खुला रखने की गारंटी दे।
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच 60 दिनों के संघर्षविराम और परमाणु कार्यक्रम पर नई बातचीत को लेकर एक प्रारंभिक समझौता तैयार हो चुका है, लेकिन अंतिम मंजूरी अभी बाकी है। बताया जा रहा है कि ट्रंप खुद इस डील की हर शर्त की समीक्षा कर रहे हैं।
हालांकि सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ईरान ट्रंप की इन कड़ी शर्तों को स्वीकार करेगा? विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान आर्थिक दबाव और प्रतिबंधों से राहत चाहता है, लेकिन अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर वह पूरी तरह पीछे हटने को तैयार नहीं दिखता। ऐसे में आने वाले दिनों में दोनों देशों के बीच बातचीत बेहद अहम रहने वाली है।
अगर यह समझौता सफल होता है तो पश्चिम एशिया में तनाव कम हो सकता है और वैश्विक तेल बाजार को भी राहत मिल सकती है। लेकिन यदि बातचीत विफल होती है, तो क्षेत्र में सैन्य और आर्थिक तनाव फिर बढ़ सकता है।
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