अब तक भारत के मानव अंतरिक्ष मिशनों के लिए मुख्य रूप से सैन्य पृष्ठभूमि वाले टेस्ट पायलटों का चयन किया जाता रहा है। लेकिन अंतरिक्ष तकनीक के तेजी से विस्तार और लंबे अवधि वाले मिशनों की जरूरत को देखते हुए इसरो अब वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, डॉक्टर्स और अन्य STEM (Science, Technology, Engineering, Mathematics) प्रोफेशनल्स को भी अंतरिक्ष कार्यक्रम का हिस्सा बनाना चाहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य के स्पेस मिशन केवल उड़ान संचालन तक सीमित नहीं रहेंगे। अंतरिक्ष में रिसर्च, मेडिकल एक्सपेरिमेंट, रोबोटिक्स, AI, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस स्टेशन संचालन जैसी नई चुनौतियों के लिए अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों की जरूरत होगी। यही वजह है कि इसरो अपने चयन मानकों को व्यापक बनाने की दिशा में काम कर रहा है।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, संभावित उम्मीदवारों के लिए शारीरिक फिटनेस, मानसिक मजबूती और तकनीकी विशेषज्ञता बेहद अहम होगी। इसके अलावा उम्मीदवारों को कठोर प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है, जिसमें माइक्रोग्रैविटी ट्रेनिंग, सर्वाइवल ड्रिल, मेडिकल टेस्ट और स्पेसक्राफ्ट सिस्टम की समझ शामिल होगी।
भारत का महत्वाकांक्षी Gaganyaan Mission इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह माना जा रहा है। इस मिशन के जरिए भारत मानव को अंतरिक्ष में भेजने वाला चुनिंदा देशों में शामिल होने जा रहा है। आने वाले वर्षों में यदि भारत अपना स्पेस स्टेशन विकसित करता है या अंतरराष्ट्रीय मिशनों में भागीदारी बढ़ाता है, तो बड़ी संख्या में प्रशिक्षित अंतरिक्ष यात्रियों की जरूरत पड़ेगी।
हालांकि इसरो ने अभी नागरिक एस्ट्रोनॉट भर्ती के लिए आधिकारिक प्रक्रिया और तारीखों का एलान नहीं किया है, लेकिन संकेत मिल रहे हैं कि आने वाले वर्षों में इसके लिए औपचारिक ढांचा तैयार किया जा सकता है। इससे देश के लाखों युवाओं और वैज्ञानिकों के लिए अंतरिक्ष क्षेत्र में करियर के नए रास्ते खुलेंगे।
अगर यह योजना सफल होती है, तो भविष्य में भारत का कोई वैज्ञानिक, इंजीनियर या रिसर्चर भी अंतरिक्ष की यात्रा करते हुए दिखाई दे सकता है। यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक नए युग की शुरुआत मानी जा रही है।
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