क्या आपका स्मार्टफोन कुछ समय बाद धीमा पड़ जाता है, बैटरी जल्दी खत्म होने लगती है और बार-बार चार्ज करना पड़ता है? अगर हां, तो यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता। इसे टेक्नोलॉजी की दुनिया में
Planned Obsolescence कहा जाता है—एक ऐसी रणनीति, जिसमें कंपनियां अपने उत्पादों को सीमित समय तक बेहतर प्रदर्शन के लिए डिजाइन करती हैं, ताकि उपभोक्ता जल्दी नया डिवाइस खरीदने पर मजबूर हो जाएं।
अब European Union ने इस कथित ‘सीक्रेट गेम’ पर सख्ती दिखानी शुरू कर दी है। यूरोपीय यूनियन का मानना है कि स्मार्टफोन कंपनियां सॉफ्टवेयर अपडेट्स, बैटरी डिजाइन और रिपेयर में बाधाओं के जरिए डिवाइस की लाइफ को जानबूझकर कम कर सकती हैं।
इसी को देखते हुए EU नए नियम लागू करने की दिशा में काम कर रहा है, जिनका मकसद स्मार्टफोन की उम्र बढ़ाना और उन्हें आसानी से रिपेयर करने योग्य बनाना है। प्रस्तावित नियमों के तहत कंपनियों को लंबे समय तक सॉफ्टवेयर अपडेट देना होगा, बैटरी को आसानी से बदलने योग्य बनाना होगा और स्पेयर पार्ट्स उपलब्ध कराने होंगे।
इस कदम का सीधा असर बड़ी टेक कंपनियों जैसे Apple और Samsung पर पड़ सकता है, जो वैश्विक स्मार्टफोन बाजार में प्रमुख भूमिका निभाती हैं। अगर ये नियम लागू होते हैं, तो कंपनियों को अपने डिजाइन और बिजनेस मॉडल में बदलाव करना पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि EU का यह कदम न सिर्फ उपभोक्ताओं के लिए फायदेमंद होगा, बल्कि ई-वेस्ट (इलेक्ट्रॉनिक कचरा) को कम करने में भी मदद करेगा। लंबे समय तक चलने वाले और आसानी से रिपेयर होने वाले स्मार्टफोन पर्यावरण के लिए भी बेहतर साबित होंगे।
कुल मिलाकर, अगर ये नियम सख्ती से लागू होते हैं, तो आने वाले समय में स्मार्टफोन खरीदने और इस्तेमाल करने का तरीका पूरी तरह बदल सकता है—जहां टिकाऊपन और पारदर्शिता को ज्यादा महत्व दिया जाएगा।
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