भारतीय मुद्रा रुपये में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है। डॉलर के मुकाबले रुपया पहली बार 95.20 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया। रुपये की इस बड़ी कमजोरी ने शेयर बाजार से लेकर आम लोगों की जेब तक चिंता बढ़ा दी है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली, कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल और वैश्विक आर्थिक दबाव इसके प्रमुख कारण माने जा रहे हैं।
दरअसल, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। ऐसे में जब तेल महंगा होता है, तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव बनता है और उसकी कीमत गिरने लगती है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और वैश्विक सप्लाई को लेकर चिंताओं ने क्रूड ऑयल की कीमतों को ऊपर पहुंचा दिया है।
रुपये की कमजोरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया। सेंसेक्स और निफ्टी में भारी गिरावट दर्ज की गई। निवेशकों में घबराहट के कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारतीय बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया। जब विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बेचकर डॉलर खरीदते हैं, तब भी रुपये पर अतिरिक्त दबाव बनता है।
इसके अलावा अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति भी रुपये की गिरावट का एक बड़ा कारण मानी जा रही है। अमेरिका में ब्याज दरें ऊंची रहने से निवेशकों का रुझान अमेरिकी बाजार की ओर बढ़ रहा है। इससे डॉलर मजबूत हो रहा है और उभरते बाजारों की मुद्राएं कमजोर पड़ रही हैं।
रुपये में आई इस गिरावट का सीधा असर आम जनता पर भी पड़ सकता है। पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका बढ़ जाती है, क्योंकि तेल आयात महंगा हो जाता है। इसके साथ ही विदेश में पढ़ाई, यात्रा और आयातित सामान भी महंगे हो सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक सामान, मोबाइल और कई विदेशी उत्पादों की कीमतों पर भी असर पड़ने की संभावना है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को संभालने की कोशिश कर सकता है। अगर कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आती है और विदेशी निवेश दोबारा भारतीय बाजार में लौटता है, तो रुपये को कुछ राहत मिल सकती है। फिलहाल बाजार की नजर वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों और तेल की कीमतों पर बनी हुई है।

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