हाल ही में सामने आई एक रिसर्च ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। शोध में दावा किया गया है कि बच्चों के स्कूल यूनिफॉर्म और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले कुछ कपड़ों में ऐसे खतरनाक केमिकल पाए गए हैं, जो लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि इन रसायनों का लगातार संपर्क कैंसर समेत कई बीमारियों के जोखिम को बढ़ा सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, कई कपड़ों में इस्तेमाल होने वाले सिंथेटिक फैब्रिक, रंग और वॉटर-रेसिस्टेंट कोटिंग में हानिकारक रसायन मौजूद हो सकते हैं। इनमें कुछ केमिकल्स ऐसे होते हैं जिन्हें “फॉरएवर केमिकल्स” भी कहा जाता है, क्योंकि वे लंबे समय तक वातावरण और शरीर में बने रह सकते हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के स्कूल यूनिफॉर्म में दाग-धब्बों और पानी से बचाव के लिए इस्तेमाल की जाने वाली केमिकल कोटिंग चिंता का बड़ा कारण बनी है। वैज्ञानिकों का कहना है कि बच्चों की त्वचा संवेदनशील होती है, इसलिए ऐसे रसायनों का असर उन पर ज्यादा हो सकता है। लंबे समय तक संपर्क रहने पर हार्मोनल गड़बड़ी, इम्यून सिस्टम पर असर और कुछ मामलों में कैंसर का खतरा बढ़ने की आशंका जताई गई है।
शोधकर्ताओं ने केवल यूनिफॉर्म ही नहीं, बल्कि रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली कई अन्य चीजों को लेकर भी अलर्ट जारी किया है। इनमें नॉन-स्टिक बर्तन, कुछ प्लास्टिक उत्पाद, वाटरप्रूफ कपड़े और केमिकल-ट्रीटेड घरेलू सामान शामिल हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि लोग अक्सर बिना जानकारी के इन उत्पादों का लगातार इस्तेमाल करते रहते हैं।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि सिर्फ किसी केमिकल की मौजूदगी का मतलब तुरंत बीमारी होना नहीं है। खतरा लंबे समय तक और बार-बार संपर्क में रहने से बढ़ता है। इसलिए घबराने के बजाय सावधानी बरतना ज्यादा जरूरी है।
बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए क्या करें?
- बच्चों के लिए संभव हो तो कॉटन या प्राकृतिक फैब्रिक वाले कपड़े चुनें
- नए कपड़े पहनाने से पहले अच्छी तरह धो लें
- तेज केमिकल गंध वाले कपड़ों से बचें
- अत्यधिक केमिकल-कोटेड या वाटरप्रूफ फैब्रिक का सीमित उपयोग करें
- घर में प्लास्टिक और सिंथेटिक उत्पादों का उपयोग कम करने की कोशिश करें
विशेषज्ञों का मानना है कि कपड़ों और रोजमर्रा की चीजों में इस्तेमाल होने वाले केमिकल्स को लेकर जागरूकता बढ़ाना बेहद जरूरी है। आने वाले समय में इस विषय पर और बड़े शोध सामने आ सकते हैं, जो उपभोक्ता सुरक्षा और बच्चों के स्वास्थ्य को लेकर नई नीतियों का आधार बन सकते हैं।
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