रक्तदान को जीवन बचाने वाला सबसे बड़ा मानवीय कार्य माना जाता है, लेकिन भारत में यह सवाल अक्सर उठता है कि क्या ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुष या यौनकर्मी रक्तदान कर सकते हैं। हाल ही में इस मुद्दे पर केंद्र सरकार ने Supreme Court of India में अपना पक्ष रखा है और मौजूदा प्रतिबंध को सही ठहराया है।
सरकार का कहना है कि ट्रांसजेंडर, समलैंगिक पुरुष और यौनकर्मियों द्वारा रक्तदान पर जो रोक लगाई गई है, वह किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है। बल्कि यह निर्णय पूरी तरह से सार्वजनिक स्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। सरकार के मुताबिक रक्तदान से जुड़े नियम वैज्ञानिक आंकड़ों और चिकित्सा विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर बनाए गए हैं।
केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि रक्तदान से पहले दानकर्ता की जांच और जोखिम का आकलन बेहद जरूरी होता है। कुछ वर्गों को “हाई-रिस्क कैटेगरी” में रखा जाता है, क्योंकि उनमें कुछ संक्रमणों के फैलने की संभावना अधिक मानी जाती है। इसी कारण से मौजूदा दिशानिर्देशों में इन समूहों को रक्तदान से बाहर रखा गया है।
भारत में रक्तदान से जुड़े दिशा-निर्देश National Blood Transfusion Council और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह से तय किए जाते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि मरीजों को सुरक्षित और संक्रमण-मुक्त रक्त उपलब्ध हो।
सरकार ने अदालत में यह भी स्पष्ट किया कि यह नीति किसी व्यक्ति की पहचान या अधिकारों को निशाना बनाने के लिए नहीं है। बल्कि इसका मकसद केवल रक्त प्राप्त करने वाले मरीजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
हालांकि इस मुद्दे पर सामाजिक संगठनों और अधिकार कार्यकर्ताओं की अलग राय भी है। उनका कहना है कि केवल यौन पहचान के आधार पर रक्तदान पर रोक लगाना उचित नहीं है और इसे वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तय किया जाना चाहिए।
फिलहाल यह मामला Supreme Court of India में विचाराधीन है और अदालत के अंतिम फैसले के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि भविष्य में रक्तदान से जुड़े नियमों में कोई बदलाव होगा या नहीं।
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