मानवता सौहार्द और एकता का सर्वोच्च संदेश है विद्यार्थी जी का बलिदान

कानपुर। 25 मार्च भारतीय इतिहास में एक ऐसी तिथि है जो पत्रकारिता, सामाजिक न्याय और मानवीय एकजुटता की महान परंपरा की याद दिलाती है। इसी दिन 1931 में महान स्वतंत्रता सेनानी, निर्भीक पत्रकार और मानवतावादी गणेश शंकर विद्यार्थी ने कानपुर के सांप्रदायिक दंगों के बीच लोगों की जान बचाते हुए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए थे। उनकी शहादत केवल एक व्यक्ति का बलिदान नहीं थी, बल्कि यह मानवता, सौहार्द और एकता के लिए दिया गया सर्वोच्च संदेश था। यह बात जर्नलिस्ट एंड एक्टिविस्ट फोरम के तत्वावधान में विद्यार्थी जी की शहादत दिवस पर आयोजित संगोष्ठी में वक्ताओं ने कही। फोरम ने 'मानवीय एकजुटता दिवस' के रूप में मनाने का संकल्प लिया।

शास्त्री भवन में आयोजित गणेश शंकर विद्यार्थी जी की श्रद्धांजलि सभा में विद्यार्थी जी का हिंदी पत्रकारिता में योगदान विषयक संगोष्ठी के मुख्यवक्ता इतिहासकार रामकिशोर वाजपेई ने कहा कि विद्यार्थी जी का जीवन इस बात का उदाहरण है कि पत्रकारिता केवल खबरों का व्यवसाय नहीं, बल्कि समाज को सही दिशा देने का माध्यम भी है। प्रो शिवकुमार दीक्षित ने कहा कि विद्यार्थीजी ने अपने प्रसिद्ध अखबार ‘प्रताप’ के माध्यम से ब्रिटिश शासन के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता तथा सांप्रदायिकता का दृढ़ता से विरोध किया।

1931 में कानपुर में भड़के सांप्रदायिक दंगों के बीच फंसे लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाते रहे। उन्होंने कहा कि उनकी शहादत हमें यह संदेश देती है कि धर्म, जाति और भाषा से ऊपर उठकर इंसानियत को सर्वोच्च स्थान देना ही सच्चा राष्ट्रधर्म है। जर्नलिस्ट एंड एक्टिविस्ट फोरम के संयोजक वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा ने कहा कि फोरम ने 25 मार्च को “मानवीय एकजुटता संकल्प दिवस” के रूप में मनाने का निर्णय लिया है। समाज में प्रेम, सहिष्णुता और भाईचारे की भावना को मजबूत करने का संकल्प लिया गया। वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में, जब समाज में कभी-कभी विभाजनकारी प्रवृत्तियाँ दिखाई देती हैं, गणेश शंकर विद्यार्थी का आदर्श और भी अधिक प्रासंगिक हो जाता है। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि सच्चा देशभक्त वही है जो हर परिस्थिति में मानवता की रक्षा के लिए खड़ा हो। इस दिन हमें केवल श्रद्धांजलि देने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। 


 गणेश शंकर विद्यार्थी की शहादत हमें यह याद दिलाती है कि मानवता की रक्षा के लिए दिया गया बलिदान कभी व्यर्थ नहीं जाता। उनके आदर्शों पर चलकर एक सौहार्दपूर्ण, न्यायपूर्ण और एकजुट समाज के निर्माण में अपनी भूमिका निभाएँगे। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। संगोष्ठी की अध्यक्षता अमरउजाला के पूर्व संपादक सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने तथा संचालन पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव ने किया। सर्वश्री प्रो डॉ एसके दीक्षित, कौशल किशोर शर्मा, विनोद टंडन, डॉ रमेश वर्मा, अनिल वाजपेई भुल्लड अतहर नईम, नौशाद आलम मंसूरी, रोहित अवस्थी एडवोकेट, अनूप श्रीवास्तव, मनोजकांत मिश्र, आलोक अग्रवाल, क्रांतिकुमार कटियार आदि ने विचार व्यक्त किए।

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