पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर अब वैश्विक बाजारों के साथ-साथ भारतीय मुद्रा पर भी साफ दिखाई दे रहा है। सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले टूटकर अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। बाजार में बढ़ते दबाव के बीच रुपया गिरकर लगभग 92.52 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, जिससे आर्थिक चिंताएं बढ़ गई हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार इस गिरावट की सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में बढ़ता संघर्ष है। United States, Israel और Iran के बीच बढ़ते युद्ध जैसे हालात ने वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा कर दी है। निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर रुख कर रहे हैं, जिसके कारण डॉलर की मांग तेजी से बढ़ गई है। इसी वजह से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ रहा है, जिसमें भारतीय रुपया भी शामिल है।
दूसरी बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत बढ़कर करीब 118 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमत बढ़ने से डॉलर की मांग और ज्यादा बढ़ जाती है। इससे रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है और उसकी कीमत कमजोर होती जाती है।
बाजार विश्लेषकों का कहना है कि जब वैश्विक स्तर पर तनाव बढ़ता है तो विदेशी निवेशक जोखिम से बचने के लिए उभरते बाजारों से पैसा निकालने लगते हैं। इसका असर सीधे शेयर बाजार और मुद्रा बाजार दोनों पर पड़ता है। ऐसे माहौल में डॉलर मजबूत होता है, जबकि अन्य मुद्राएं कमजोर हो जाती हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भी इस समय काफी अहम मानी जा रही है। अगर रुपये में गिरावट तेज होती है तो केंद्रीय बैंक बाजार में हस्तक्षेप कर सकता है, ताकि मुद्रा में ज्यादा उतार-चढ़ाव को रोका जा सके। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पश्चिम एशिया का संकट कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है।
कुल मिलाकर, वैश्विक तनाव, बढ़ती तेल कीमतें और डॉलर की मजबूती ने भारतीय रुपये को ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचा दिया है। आने वाले दिनों में अंतरराष्ट्रीय हालात और केंद्रीय बैंक की रणनीति यह तय करेगी कि रुपये की दिशा क्या रहती है।
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