दुनिया में कच्चे तेल की कीमतों में एक बार फिर तेज उछाल देखने को मिल रहा है। हाल ही में अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड ऑयल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंचने लगीं, जिससे लोगों को साल 2008 का वह दौर याद आने लगा जब कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई थीं। उस समय कच्चे तेल की कीमत करीब 147 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी, जो अब तक का ऐतिहासिक उच्च स्तर माना जाता है।
यह रिकॉर्ड तेजी 2008 Oil Price Spike के दौरान देखने को मिली थी। दिलचस्प बात यह है कि उस समय किसी बड़े युद्ध की स्थिति नहीं थी, फिर भी वैश्विक बाजार में मांग और आपूर्ति के असंतुलन के कारण तेल की कीमतों में जबरदस्त उछाल आया था।
क्यों बढ़ गई थीं कीमतें
2008 में दुनिया की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही थी और ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ रही थी। खासकर चीन और भारत जैसे उभरते देशों में औद्योगिक गतिविधियां बढ़ने से तेल की खपत तेजी से बढ़ी।
इसके अलावा निवेशकों और फंड्स ने भी कमोडिटी बाजार में बड़ी मात्रा में पैसा लगाया। इस सट्टा निवेश के कारण भी तेल की कीमतें तेजी से ऊपर चली गईं। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में ट्रेड होने वाला प्रमुख बेंचमार्क Brent Crude Oil लगातार नई ऊंचाइयों को छू रहा था।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा असर
कच्चे तेल की कीमतों में इतनी बड़ी तेजी का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ा। कई देशों में पेट्रोल और डीजल की कीमतें तेजी से बढ़ गईं, जिससे महंगाई बढ़ने लगी। ट्रांसपोर्ट, बिजली उत्पादन और उद्योगों की लागत भी बढ़ गई।
हालांकि 2008 के बाद वैश्विक आर्थिक संकट शुरू हो गया, जिसके चलते तेल की मांग अचानक घट गई और कीमतों में भारी गिरावट आ गई।
आज क्यों याद आ रहा है 2008
आज जब कच्चे तेल की कीमतें फिर से 100 डॉलर से ऊपर पहुंचने लगी हैं, तो विशेषज्ञ 2008 के उस दौर को याद कर रहे हैं। हालांकि मौजूदा हालात में भू-राजनीतिक तनाव, उत्पादन नीतियां और वैश्विक मांग जैसे कई कारक कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर वैश्विक बाजार में मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन नहीं बना, तो आने वाले समय में तेल की कीमतों में और उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। ऐसे में 2008 की तरह का माहौल फिर बनने की आशंका को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
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