फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी इस वर्ष 5 फरवरी 2026 को मनाई जा रही है। यह तिथि भगवान श्रीगणेश को समर्पित होती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत रखकर विधि-विधान से पूजा करने और संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा पढ़ने से सभी कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। कहा जाता है कि कथा के बिना व्रत और पूजा अधूरी मानी जाती है।
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक नगर में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। वह भगवान गणेश का परम भक्त था, लेकिन गरीबी और कष्टों से उसका जीवन भरा हुआ था। रोज़ मेहनत करने के बावजूद उसके घर में सुख-शांति नहीं थी। एक दिन दुखी होकर उसने भगवान गणेश से अपने कष्ट दूर करने की प्रार्थना की।
उसी रात उसे स्वप्न में भगवान गणेश के दर्शन हुए। गणेश जी ने उससे कहा—
“हे द्विज! फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को संकष्टी चतुर्थी व्रत रखो, विधि-विधान से मेरी पूजा करो और चंद्र दर्शन के बाद ही भोजन करो। तुम्हारे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।”
ब्राह्मण ने भगवान की आज्ञा का पालन किया। उसने पूरे दिन उपवास रखा, गणेश जी की पूजा की, कथा सुनी और चंद्रमा के दर्शन के बाद व्रत खोला। कुछ ही समय में उसके जीवन में चमत्कारी बदलाव आने लगे। उसकी गरीबी दूर होने लगी, घर में सुख-शांति आई और समाज में उसे मान-सम्मान मिलने लगा।
यह देखकर नगर के अन्य लोग भी इस व्रत की महिमा से प्रभावित हुए और संकष्टी चतुर्थी का व्रत करने लगे। तभी से यह मान्यता प्रचलित हो गई कि द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी का व्रत श्रद्धा और कथा-पाठ के साथ करने से सभी विघ्न दूर होते हैं।
व्रत का महत्व
द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी विशेष रूप से
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संतान सुख
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रोग, शोक और मानसिक तनाव से मुक्ति
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आर्थिक समस्याओं के समाधान
के लिए अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
निष्कर्ष
फाल्गुन द्विजप्रिय संकष्टी चतुर्थी के दिन पूजा के समय इस व्रत कथा का पाठ अवश्य करें। मान्यता है कि कथा सुनने और पढ़ने से भगवान गणेश शीघ्र प्रसन्न होते हैं और भक्तों के सभी संकट हर लेते हैं।
गणपति बप्पा मोरया!
आपके जीवन से सभी विघ्न दूर हों और सुख-समृद्धि बनी रहे।
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