रूस से भारत को कच्चे तेल की आपूर्ति फिलहाल जारी रहने वाली है, लेकिन इसके साथ ही आयात में धीरे-धीरे कटौती की कवायद भी शुरू हो चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, देश की तेल रिफाइनरियों को अभी तक रूस से तेल खरीद रोकने का कोई औपचारिक आदेश नहीं मिला है। हालांकि, अनौपचारिक स्तर पर संकेत दिए गए हैं कि आने वाले समय में रूसी तेल पर निर्भरता कम की जाए।
जानकारों का कहना है कि मौजूदा स्थिति में अधिकांश रिफाइनरियां पहले से किए गए खरीद समझौतों और ऑर्डरों को पूरा करेंगी। आमतौर पर ये अनुबंध 6 से 8 सप्ताह की अवधि के होते हैं, इसलिए निकट भविष्य में सप्लाई पर तत्काल असर पड़ने की संभावना कम है। इन कॉन्ट्रैक्ट्स के पूरा होने तक रूस से तेल की खेप आती रहेगी, लेकिन उसके बाद नए ऑर्डर देने से परहेज किया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार, सरकार और संबंधित एजेंसियां वैश्विक भू-राजनीतिक हालात, प्रतिबंधों के दबाव और कूटनीतिक संतुलन को ध्यान में रखते हुए रणनीति पर काम कर रही हैं। भारत ने अब तक ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए सस्ता रूसी कच्चा तेल खरीदा है, जिससे घरेलू बाजार में कीमतों को नियंत्रित रखने में मदद मिली। हालांकि बदलते अंतरराष्ट्रीय समीकरणों के बीच अब विकल्पों पर भी गंभीरता से विचार किया जा रहा है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि रूस से तेल आयात में संभावित कटौती एकदम से नहीं होगी, बल्कि यह चरणबद्ध तरीके से की जाएगी। इसकी वजह यह है कि अचानक सप्लाई रोकने से रिफाइनरियों के संचालन और ईंधन आपूर्ति श्रृंखला पर असर पड़ सकता है। ऐसे में मध्य पूर्व, अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों से आयात बढ़ाने की रणनीति पर काम किया जा रहा है, ताकि किसी तरह की कमी न हो।
विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत के पास फिलहाल पर्याप्त विकल्प मौजूद हैं और वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की उपलब्धता बनी हुई है। इसलिए रूस से आयात घटने की स्थिति में भी देश की ऊर्जा जरूरतों पर बड़ा संकट आने की आशंका कम है। कुल मिलाकर, संकेत साफ हैं कि रूस से तेल की सप्लाई अभी जारी रहेगी, लेकिन भविष्य में आयात को संतुलित और विविध बनाने की दिशा में कदम तेज़ हो सकते हैं।
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